सोमवार, सितंबर 21, 2009

पितृ पुरुष्‍ा के नाम पर पत्रकारिता संस्‍थान

--------- राजेन्द्र माथुर स्मृति पत्रकारिता संस्थान की स्थापना -------
स्वाधीन भारत में हिन्दी पत्रकारिता को स्थापित करने वाले दिवंगत पत्रकार स्वर्गीय राजेन्द्र माथुर का पूरा जीवन हिन्दी के लिये समर्पित रहा। मप्र के मालवा अंचल के इस प्रतिभावान पत्रकार ने यह प्रमाणित कर दिया कि ऊंचाई प्राप्त करने के लिये महानगर में पैदा होना आवश्यक नहीं है। नईदुनिया इंदौर से अपनी पत्रकारिता यात्रा आरंभ करने वाले श्री माथुर हिन्दी राष्ट्रीय दैनिक नवभारत टाइम्स के सम्पादक बने। आरंभ से अपनी आखिरी सांस तक ठेठ हिन्दी पत्रकार का चोला पहने रहे।
हिन्दी पत्रकारिता का विस्तार हुआ है और जब जब हिन्दी पत्रकारिता की बात आती है, रज्जू भइया का नाम जरूर स्मरण में आता है। दुर्भाग्य से आज वे हमारे बीच नहीं हैं। इससे भी बड़े दुर्भाग्य की बात यह है कि पत्रकारिता की शिक्षा पाने वाली नवागत पीढ़ी के अधिकांश लोगों को राजेन्द्र माथुर सरीखे पत्रकार के बारे में या तो जानकारी ही नहीं है अथवा है तो आधी-अधूरी। ऐसे में लगा कि आज और अभी समय रहते स्वर्गीय राजेन्द्र माथुर की पत्रकारिता को लेकर कोई पहल नहीं की गई तो इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा।
इसी सोच के साथ हम कुछ युवा साथियों जिनमें ज्यादतर स्वतंत्र पत्रकार हैं और जिनका जीवनयापन ही मुश्किल से चलता है ने मिलकर राजेन्द्र माथुर समृति पत्रकारिता संस्थान की स्थापना का सविनय पहल की है। आरंभिक दिनों में राजेन्द्र माथुर समृति व्याख्यान माला आरंभ किया जाएगा। प्रत्येक माह पत्रकारिता के समसामयिक विषयों पर सुधि पत्रकारों का व्याख्यान होगा।
फिलवक्त दो अक्टूबर 2009 को भोपाल में पहला व्याख्यान आयोजित करने का मन है। हम सब साथियों का आग्रह है कि रज्जू बाबू से संबंधित आपके पास संकलित/संग्रहित सामग्री भेजने के लिये मनोज कुमार संयोजक राजेन्द्र माथुर स्मृति पत्रकारिता संस्थान मो. 9300469918/ 9407514330 पर सम्पर्क किया जा सकता है। साभार मीडिया ख़बर

रविवार, सितंबर 20, 2009

अख़बार में कुछ काम की बातें

पिछले दिनों एक किताब पढ़ी है जिसमें न्‍यूजरूम, आइडिया और रिपोर्टिंग से संबंधित कुछ चीजें दी गई है। किताब अंगरेजी में है। मैं बहुत अच्‍छा अनुवादक तो नहीं हूं फिर सुधि मित्र काम की चीज समझ लेंगे। शेष हिस्‍सा समय-समय पर देता रहूंगा। फिलहाल इतने से काम चलाएं
अपना आइडिया लिखित में दें
रिपोर्टर को अपना आइडिया लिखित में देना चाहिए, चाहे वह स्‍पेशल स्‍टोरिज हो या महत्‍वपूर्ण ख़बर। एक छोटे से नोट में यह बताना चाहिए ख़बर का एंगल क्‍या होगा, इस ख़बर से कौन सा वर्ग प्रभावित होगा। पाठक के लिए ख़बर कितनी महत्‍वपूर्ण है। विजुअल (जैसे फोटो, ग्राफिक्‍स, कार्टुन, इलेस्‍ट्रेशन) क्‍या होगा, कितने दिन में ख़बर पूरी हो सकेगी, अगर ख़बर में कोई खर्च हो तो उसे भी दर्शाएं, आपकी ख़बर कितने दिन तक चलेगी अगर सीरिज चलाएं तो उल्‍लेख करें। कोशिश करें कि एक पैरा में ही यह सब हो जाएं। क्‍योंकि आपकी लंबी चौड़ी चिट्ठी पढ़ने का टाइम संपादक के पास नहीं होगा।
समय प्रधान ख़बरें दें
संपादक तब खुश होंगे जब उन्‍हें समय के अनुरूप ख़बरें मिलेंगी। मतलब ये कि दीवाली में पटाखों के बाजार पर अच्‍छी स्‍टोरी हो सकती है, लेकिन दीवाली के तीन महीने पहले ये स्‍टोरी लिखना कि पटाखों का बाजार सजने लगा है। समय के अनुसार ठीक नहीं है। भूत, भविष्‍य और वर्तमान को ध्‍यान में रखकर स्‍टोरी करनी चाहिए। किसी केस की सुनवाई के पहले केस से संबंधित कोई धमाकेदार ख़बर आपके अख़बार की बिक्री बढ़ा सकती है। जब कोई रिपोर्टर कोई एवरग्रीन स्‍टोरी पेश करता है तो उसे बताना चाहिए कि वह इस समय क्‍यों ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण है। अगर आपका कोई आइडिया रिजेक्‍ट कर दिया गया हो तो कभी उसे खत्‍म न समझें, हो सकता है समय के हिसाब से वो प्रांसगिक हो जाए। संपादक को बताएं कि किस तरह वह रिजेक्‍ट किया हुआ आइडिया अब एंगल बदलकर महत्‍वपूर्ण हो सकता है।
लोकल से नेशनल –
अगर आप लोकल ख़बर कर रहे तो उसे नेशनल सिचुएशन से कंपेयर करें। ठीक यही स्थिति नेशनल ख़बर के साथ भी होती है। जबकि कोई ख़बर नेशनल होती है तो देखें उसी एंगल पर लोकल क्‍या हो सकता है। उदाहरण के लिए जब छठे वेतनमान से केंद्रीय कर्मचारियों की पेंशन बढ़ने की ख़बर आई तो देखना चाहिए कि राज्‍य के कर्मचारियों की पेंशन कितनी बढ़ेगी फिर दोनों का तुलानात्‍मक अध्‍ययन करें। कुछ एक्‍सपर्ट्स से बात करें। बेहतरीन स्‍टोरी होगी। यही नियम अन्‍य ख़बरों के साथ लागू करें।
पुराना महत्‍वपूर्ण है
हमेशा अपने अख़बार को ध्‍यान से पढ़ना चाहिए, दूसरे अख़बार पढ़ने की भी आदत होना ही चाहिए। अगर कोई स्‍टोरी कर रहे हो। तो देखें आपके या अन्‍य अख़बार में कुछ सालों, महीनों दिनों पहले उस मुद्दे पर क्‍या छापा था। ये उल्‍लेख करें तब और अब सिचुएशन क्‍या है। किस तरह पूरी सिचुएशन बदल गई है। जारी…

रविवार, सितंबर 13, 2009

ब्‍लैक एंड व्‍हाइट ही ठीक था जनसत्‍ता



आज का जनसत्‍ता देखा अंतिम पेज खोला, तले में एक फोटो थी जिसके ऊपर ख़बर लिखी गई थी। इतना बुरा प्रयोग तो मैंने पहले कभी नहीं देखा। इतने डार्क फोटो के ऊपर ब्‍लैक टैक्‍सट। वैसे जनसत्‍ता के स्‍पोर्ट्स पेज पर अक्‍सर बहुत बुरे बुरे प्रयोग होते हैं। कभी इतना बुरा कट आउट बनता है कि क्रिकेटर की टोपी कट जाती है, तो कभी हाथ। रंगों के इस्‍तेमाल का तो पूछो मत। लाल पीले, इतने चटक रंग कि क्‍या कहने और रंगों के संयोजन की तो बात ही छोड़ो दो। फ्रंट पेज के बॉटम में ऐसा कलर बॉक्‍स फंसाते हैं कि लीड फोटो दब जाती है। रंगों का इतना बुरा इस्‍तेमाल शाम के अख़बार वाले भी नहीं करते। अगर जनसत्‍ता में ऑपरेटर पेज बनाते हैं तो इन रंगों का इस्‍तेमाल भी वहीं करते होंगे। अगर जनसत्‍ता में संपादकीय के लोग ही पेज बनाते हैं, तो ये बहुत बुरी बात है कि वे इस तरह रंगों का इस्‍तेमाल करते हैं। लेआउट की जनसत्‍ता में बात ही छोड़ो। इसलिए लगता है जब जनसत्‍ता ब्‍लैक एंड व्‍हाइट था तब ज्‍यादा ठीक था।

शनिवार, सितंबर 12, 2009

टर्की में भी बेहतरीन पत्रकारिता

अभी तक तो अपन तो समझते थे कि हिंदुस्‍तान में ही अख़बार लेआउट को लेकर तड़क भड़क का प्रयोग करते हैं। जब आज टर्की के अख़बार देखे तो देखता रह गया। क्‍या अख़बार बनाते हैं, लेआउट तो शानदार है ही उसके साथ कंटेट भी जोरदार देते हैं। बिंदुवार ऐसी जानकारी जुटाते हैं क्‍या कहना। इस्‍तानबुल से निकलने वाला एक अख़बार है मिलियट देखों क्‍या ख़बर परोसी है। लीड ख़बर में ग्राफिक्‍स, इलेस्‍ट्रेशन, पाइंट्स सब कुछ जुटाए गए हैं। यहां के कुछ अख़बार फुल पेज बॉक्‍स का भी इस्‍तेमाल करते हैं।
हेडर नहीं ‘मिडर’
एक खास बात यहां के अख़बारों में हेडर नहीं ‘मिडर’ होता है। मतलब यहां के अख़बारों में हेडर फ्रंट पेज के बीचोबीच होता है। अगर नया आदमी अख़बार पढ़े तो समझे कोई हेडिंग होगी। सबह, ऑले, हबर तुर्क ऐसे अख़बार हैं जिनके बीच में अख़बार का नाम है। जहां हेडर होता है वहां लीड की हेडलाइन है। यहां अपने यहां जैसे ज्‍यादा ख़बरें तो नहीं भरी जातीं लेकिन अमेरिका और यूके जैसे एक ख़बर में फ्रंट पेज नहीं समेटा जाता है। चार पांच ख़बर होती है अमूमन सभी ख़बरों का अच्‍छे से ट्रीटमेंट किया जाता है (बुगन नाम का अख़बार देखें)

गुरुवार, सितंबर 10, 2009

नईदुनिया दिल्‍ली का जबरदस्‍त प्रयोग

मैं हमेशा से अख़बारों में प्रयोगों का समर्थक रहा हूं। पिछले दिनों एक सुधि मित्र ने टिप्‍पणी की थी, संभलकर बाबू लोगों की मानसिकता अभी भी पिछड़ी है। आज जब नईदुनिया दिल्‍ली का संस्‍करण देखा तो पता चला साढे छह दशक पुराने अख़बार की मानसिकता साढे छह साल के बच्‍चे जितनी नई है जो प्रयोग से नहीं घबराता है। एक ऐसा ही पेज नईदुनिया दिल्‍ली ने छापा है। ये देखने में थोड़ा अटपटा जरूर लगता है लेकिन काबिले तारीफ है। क्‍योंकि हर अजीब चीज देखने उसे जानने की उत्‍सुकता बढ़ाती है। इसलिए मैं ये भी कह सकता हूं, आज इस पेज का पाठकों ने खूब आनंद लिया होगा। वैसे ये प्रयोग साल दो साल में एक बार करने लायक प्रयोग है। प्रयोग क्‍या खुद ही देख लीजिए।

वाल स्‍ट्रीट जरनल और न्‍यू यार्क टाइम्‍स सेन फ्रॉन्सिस्‍को में

कुछ दिनों पहले एक रिपोर्ट आई थी कि अमेरिका में ई संस्‍करणों के शुरू होने के कारण अख़बारों की प्रिंटिंग बंद होने वाली है। रिपोर्ट में ये भी था कुछ पांच छह साल में अमेरिका में अख़बार छपना ही बंद हो जाएगा। लेकिन दोस्‍तों आपको बता दूं कि अमेरिका के दो बड़े अख़बार वाल स्‍ट्रीट जरनल और न्‍यू यार्क टाइम्‍स सेन फ्रॉन्सिस्‍को संस्‍करण शुरू करने जा रहा है। इस शहर का नाम आपने शाहरुख के वो गाने दिल में मेरे है दर्दे डिस्‍को में सुना होगा। ये दोनों अख़बार नवंबर-दिसंबर में शुरू होंगे। द वाल स्‍ट्रीट जरनल न्‍यूयॉर्क शहर से कल्‍चर पर फोकस करता हुआ एक सेक्‍शन शुरू करने जा रहा है। तो फिर क्‍या ये रिपोर्ट्स झूठी नहीं हैं जिनमें कहा गया है प्रिंट मीडिया अमेरिका से खत्‍म हो जाएगा। अगर ये रिपोर्ट्स सच्‍ची हैं तो फिर क्‍यों ये दो बड़े अख़बार अमेरिका के दूसरे सबसे बड़े शहर में अख़बार लांच कर रहे हैं। सही बात तो ये है कि प्रिंट मीडिया एक वृहद संस्‍कृति है जिसे इंटरनेट खत्‍म नहीं कर सकता। हां ये जरूर है कि इंटरनेट का प्रचलन बढ़ गया हो। ये बात ठीक वैसे ही जैसे पित्‍जा आने से कोई दाल चावल खाना थोड़े ही छोड़ देगा।

रविवार, सितंबर 06, 2009

ऑस्‍ट्रेलिया के अख़बार


आज बात करते हैं ऑस्‍ट्रेलिया के अख़बारों की। यहां के अख़बारों में स्‍पोर्ट्स छाया रहता है। ठीक वैसे ही जैसे ऑस्‍ट्रेलियन क्रिकेट टीम छाई रहती है। वो अलग बात है कि अब कंगारू पहाड़ से नीचे आ गए हैं। लगता है ऑस्‍ट्रेलिया के लोगों को खेलों में खास रुचि है इसलिए यहां के अख़बारों में खेल की ख़बरें ही लीड बनती है। खेल के ही फोटो लगाए जाते हैं। आपके लिए पेश है ऑस्‍ट्रेलिया के कुछ प्रमुख अख़बारों के प्रथम पेज जिन पर सिर्फ और सिर्फ खेल छाया हुआ है। लेकिन कुछ अख़बार ऐसे भी है जो खेल को तरजीह नहीं देते। यहां जो अख़बार निकलते हैं उनमें हेराल्‍ड सन है जो मेलबर्न से प्रकाशित होता है। वैसे मेलबर्न का क्रिकेट स्‍टेडियम दुनिया के सबसे खूबसूरत स्‍टेडियम्‍स में से एक है। द एज (मेलबर्न से प्रकाशित), द ऑस्‍ट्रेलियन फाइनेंस (सिडनी), द बॉर्डर मेल (अलबरी-वोडॉन्‍गा), द सिडनी मॉर्निंग हेराल्‍ड (सिडनी), द वेस्‍ट ऑस्‍ट्रेलियन (पर्थ), टॉउन्‍सविली बुलेटिन (टॉउन्‍सविली) यहां के प्रमुख अख़बार हैं।

शुक्रवार, सितंबर 04, 2009

टाइम्‍स ने छापी पुरानी ख़बर







पहले हिंदुस्‍तान टाइम्‍स अब टाइम्‍स ऑफ इंडिया वाले भी पुरानी और दूसरी जगह छपी छपाई ख़बरें देने लगे हैं। स्‍वाइन फ्लू का वैक्‍सीन बन रहा। अब स्‍वाइन फ्लू दूर होगा एक या दो डोज में।
ख़बर की खास बात ये है कि ये पहले पेज पर और बायलाइन है। वो ख़बर एक दिन पहले कोलकाता के टेलीग्राफ में छप चुकी है। जिस University of Leicester में दवा की खोज की बात की जा रही है। वो कहां की है, ये किसी को कुछ पता नहीं है, पूरी ख़बर में लापता है। मैं तो ये समझा की ये यू Leicester यूनिवर्सिटी कहीं असम, मिजोरम की तो नहीं। फिर सर्च किया तो पता चला ये University of Leicester यूके की है। जबकि टेलीग्राफ में साफ साफ लिखा है कि ये यूनिवर्सिटी यूके की है। टेलीग्राफ वालों ने भी ये ख़बर बायलाइन दी है। जबकि ये ख़बर प्रेस एसोसिएशन ने एक दिन पहले ही जारी कर दी थी। समझ नहीं आता इस ख़बर पर बायलाइन किस लिए दे दी। रिपोर्टर ने किया क्‍या सिर्फ एक एजेंसी की कॉपी उठाई, दो चार डॉक्‍टरों से बात की और फ्रंट पेज पर शानदार बायलाइन। इस मामले में हिंदी का प्रेस जगत बड़ा खराब है, संपादक बड़ी आसानी से बायलाइन नहीं देते। अगर कोई रिपोर्टर कह दे सर ये बायलाइन तो समझो उसकी खैर नहीं, लेकिन अंगरेजी प्रेस वाले तो चूहा भी मर जाए तो बायलाइन देते हैं।
चाइना भी बना रहा है स्‍वाइन फ्लू की दवा
हां एक और ख़बर अपना पड़ोसी देश चाइना भी दावा कर रहा है कि वह बस एक कदम दूर है स्‍वाइन फ्लू की दवा से। ये ख़बर अमेरिका के एक अख़बार में छपी है। ये पूरी दुनिया को मालूम है कि चाइना का माल कितना सस्‍ता होता है, जब अपन चाइना का फोन, चाइना के खिलौने इस्‍तेमाल कर सकते हैं तो चाइना की दवा क्‍यों नहीं। लेकिन अपने अख़बार तो यूके और अमेरिका की वाह वाही में लगे हैं।



अख़बार में हेडर और नए लेआउट


नए लेआउट प्रयोग करो
इस बार कुछ अच्‍छे नए लेआउट भी लाया हूं। जब पूरा पेज खाली होता है तो लेआउट की बड़ी समस्‍या आती है कैसे अच्‍छे से अच्‍छा पेज तैयार हो। कुछ ले आउट पेश है दोस्‍तों के लिए। हालांकि हमारे यहां चार या पांच ख़बरों में पेज नहीं बनता। पहले या अंदर के पेजों पर कम से कम दस या ज्‍यादा ख़बरें होती हैं। फिर भी आधा पेज तो इस लेआउट की मदद से बना ही सकते हैं। किस तरह मोटी आउटलाइन या ब्‍लैक बॉक्‍स बनाकर बॉटम को आकर्षित बनाया जा सकता है (देखिए The Dispatch)। अगर आप वर्टिकल लेआउट पसंद करते हैं तो हेराल्‍ड देखिए, वैसे भी आजकल वर्टिकल लेआउट का ही चलन है। हेराल्‍ड की तरह लंबी सिंगल तो नहीं लगा सकते लेकिन वहां पहले कॉलम की छोटी छोटी ख़बरें जरूर लगा सकते हैं जिसे हम न्‍यूज फ्लैश, एक नजर, पहली नजर आदि नाम से लगाते हैं। हेराल्‍ड ने सेंटर में पेज लगाने का मिथक भी तोड़ा है। The Arizona Republic को देखो किस तरह बोल्‍ड फांट के साथ फ्लाय लगाया है। बॉक्‍स भी बेहतरीन है, डेढ़ कॉलम भी जोरदार है। तो थोड़ा साहस करो संपादक से पंगा लो लेकिन अच्‍छा करोगे तो तारीफ भी मिलेगी।

अख़बार में हेडर और नए लेआउट

▐►हेडर पहचानो
बात करते हैं हेडर की अमेरिका के कई अख़बारों को देखकर समझ नहीं आता कि ये पहले पेज पर हेडर कौन सा है, हेडिंग कौन सा है या फिर पेनल(अंदर की ख़बरों के लिए बनाए विंडो) है। जबकि अपने यहां तो हालात ये हैं कि हेडर से बड़ा लीड का फांट साइज हो जाए तो अपने संपादकीय साथी कहने लगते हैं। संपादक भी ऐसा प्रयोग करने से डरते हैं। अंगरेजी के इक्‍का दूक्‍का अख़बार ही ऐसा प्रयोग करते हैं वो भी कभी कभार।