Sunday, November 08, 2009

हमें माफ कर देना प्रभाषजी...

हमें माफ कर देना प्रभाषजी...जिस इंदौर शहर पर आप इठलाते थे और मैं इठलाता हूं। उस शहर ने अपने सपूत को अंतिम वक्‍त में याद नहीं किया। अरविंदजी ने भड़ास पर लिखा है कि शहर की गिने चुने पत्रकार ही आपकी अंतिम यात्रा में पहुंचे, ये सुनकर एक आघात सा लगा। इंदौर वही शहर है जब पिछले दिनों एक पत्रकार पर हमला हुआ था तो सभी पत्रकारसाथी सड़क पर उतर आए थे। और जब आज पत्रकारिता का वटवृक्ष जिसकी छाया तले कई लोंगों ने शीतलता का आनंद लिया है। वो वटवृक्ष नहीं रहा तो उसकी निर्जिव काया को कंधा देने तक कोई नहीं पहुंचा। इतना बेइमान तो नहीं था ये इंदौर शहर...। ये तो वो शहर है जब बंदर या नंदी की मौत हो जाती है तो लोग गोजबाजे के साथ अंत्‍येष्टि करते हैं। अखबार वाले तीन या चार कॉलम खबर लगाते हैं। पांच महीने पहले इंदौर गया था तो लगा शहर मेट्रो सिटी बनता जा रहा है। लेकिन ये नहीं सोचा था कि पोहा जलेबी खाने वाले शहर के लोगों की दिल अखरोट की तरह सख्‍त हो जाएंगे। और तो और पत्रकारिता की नर्सरी कहलाते वाले शहर के पत्रकारों को क्‍या हो गया है। समझ नहीं आता है इंदौर जहां के पत्रकार सबसे ज्‍यादा एकजुट हैं, पत्रकार साथी पर कोई विपदा आती है तो कंधे से कंधा मिलाते हैं। फिर एक युग पुरुष की विदाई पर ये बेरुखी क्‍यों...। प्रभाषजी का इंदौरीपन कभी नहीं छूटा...दो साल से दिल्‍ली में हूं हर सप्‍ताह उनका कागद कारे पढ़ता रहा हूं। लेकिन उन्‍होंने हमेशा ‘अपन’ शब्‍द का इस्‍तेमाल किया। कभी मैं का इस्‍तेमाल नहीं किया। उन्‍होंने मालवीपन को पत्रकारिता की शैली बना दिया। लेकिन मालवा के पत्रकार उन्‍हें अंतिम पलों में श्रद्धांजलि तक नहीं दे पाए...शर्म से सिर झुक गया है। रज्‍जू बाबू (राजेंद्र माथुर) के बाद एक वर्तमान था प्रभाष जोशी...वो भी अब रज्‍जू बाबू के समकक्ष हो गया है। अरविंदजी ने लिखा कि लकड़ी कंडे भी न मिलते...ये सुनकर दिल रो पड़ा...हमें माफ कर देना प्रभाषजी... हमें माफ कर देना
फोटो – अखिल हार्डिया, इंदौर

Friday, November 06, 2009

जानते हो प्रभाषजी कहां के है...इंदौर के

अपने यहां भी जनसत्‍ता आता है, जब देखा सचिन ने 17 हजार पार कर लिए हैं तो सोच लिया था आज का बॉटम तो प्रभाषजी जरूर लिखेंगे। लेकिन मुझे क्‍या पता था मेरा अनुमान इतना गलत निकल जाएगा। सचिन के उपलब्धियों पर लिखने वाले प्रभाषजी हमे छोड़कर चले जाएंगे। जब भी प्रभाषजी की बात चलती तो इठलाते हुए मैं हमेशा कहता था जानते हो प्रभाषजी कहां के हैं....इंदौर के हैं। इंदौर में महान लोग होते हैं सच में इंदौर में महान लोग तो नहीं इंदौर में महान पत्रकार जरूर होते हैं। राजेंद्र माथुर फिर प्रभाषदा। जी भारी है सोचता हूं अब मैं कैसे कहूंगा प्रभाषजी इंदौर के हैं...जब से पत्रकारिता की समझ हुई सिर्फ दो नाम सुने राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी। रज्‍जू बा को तो देख नहीं सका लेकिन प्रभाषदा को सुना भी मिला भी देखा भी। जब भी वो कागद कारे में अपन लिखते तो मन करता कोई मालवी दिल्‍ली में कितनी सहजता से अपनी बोली लिख रहा है। आज भी जनसत्‍ता आया है लेकिन बिना प्रभाषजी और शायद अब ऐसा ही आएगा...

Wednesday, October 07, 2009

जी लो जी भरके


हाल ही में दिल्‍ली नवभारत टाइम्‍स में बेहतरीन ख़बर छपी है। पत्रकार मित्रों के भी काम आएगी। ख़बर लीक से हटकर है। पोस्‍ट में देरी के लिए क्षमा चाहता हूं, लेकिन ख़बर जोर दार है। जिनके घर नवभाटा नहीं आता यहीं पढ़ लें।


जी लो जी भरके
कहते हैं जिंदगी एक बार मिलती है, इसलिए उसे जी भरकर जीना चाहिए। लेकिन यह बात कहने-सुनने में जितनी आसान लगती है, फॉलो करने में उतनी ही मुश्किल। ख्वाहिशों की उड़ान और हकीकत के बोझ के बीच इंसान पिसकर रह जाता है। ऐसे में हर शख्स को कभी-न-कभी हताशा, निराशा, नाकामी और अकेलेपन की तकलीफ के बीच जिंदगी के बोझ बनने का अहसास घेर लेता है। घर-परिवार, यार-दोस्त, नौकरी-चाकरी से लेकर पर्सनल जरूरतों और चाहतों के बीच बेहतर तालमेल बनाकर कैसे जीएं जिंदगी को फुलटुस्स, बता रही हैं प्रियंका सिंह :
हम सभी के पास दो तरह की जिंदगी होती है। एक वह जिंदगी, जो हम जीते हैं और दूसरी वह, जो सभी के अंदर होती है लेकिन हम उसे जी नहीं पाते। जाहिर है, जरूरत इसी जिंदगी को जानने-समझने और जीने की है। इसके साथ ही यह जानना भी जरूरी है कि कामयाब जिंदगी क्या है? हालांकि हर शख्स के लिए इसकी अलग परिभाषा हो सकती है लेकिन मोटे तौर पर निम्न चीजें मिलकर एक कामयाब जिंदगी बनाती हैं :
- एक सुरक्षित और आनंददायक जगह पर रहना। - ऐसे लोगों का साथ, जो आपसे प्यार करते हों और आपकी इज्जत करते हों। - ऐसी चीजें करना, जिसने संतोष मिले और जिनका कोई रिवॉर्ड भी हो। - अपनी जरूरतें अच्छी तरह पूरी करने लायक चीजें और पैसा होना। - ऐसे समाज में रहना, जो सभी की स्वतंत्रता की हिफाजत करता हो।

सेल्फ मैनेजमेंट

1। अपने मन में साफ रखें कि हम जिंदगी में क्या पाना चाहते हैं। रोज इसके बारे में सोचें और विजुएलाइज करें। कल्पना करें कि हमने उसे पा लिया है। उस स्टेज में खुद को देखें। इससे हम उलझन से बच सकते हैं। 2। खुद से प्यार करें। हम जैसे हैं, उसी रूप में खुद को स्वीकार करें। किसी भी तरह की हीनभावना खुद पर हावी न होने दें। 3. दूसरों के लिए कुछ करना अच्छा है लेकिन दूसरों के लिए खुद को बिल्कुल भुलाना नहीं चाहिए। अपने शौक और इच्छाओं के लिए भी वक्त निकालना चाहिए। 4. हमें गुस्सा, नाराजगी, निराशा और नकारात्मक सोच जैसे नेगेटिव इमोशंस को हैंडल करना और उनसे बाहर निकलना सीखना चाहिए। अगर किसी बात या चीज से दुखी हों तो उसके बारे में सचेत हो जाएं। दुखी होते रहने के बजाय उस घटना से सबक लेकर या खुद को व्यस्त रखकर आगे बढ़ें। 5. दूसरों के पैसे, ओहदे, शोहरत से तुलना बेशक करें, लेकिन ईर्ष्या न करें। हम उनसे सीखें और खुद में कोई कमी है तो उसे दूर करें। लेकिन साथ ही अपने को भी देखें और अपने मौजूदा स्तर से आगे बढ़ें तो वही असली तरक्की है।


रिश्ते

1। दूसरे लोग हमें समझें, इससे पहले हम उन्हें समझने की कोशिश करें। उनके हालात में खुद को रखने की कोशिश करें। 2। कम्यूनिकेशन जरूरी है। बड़े-से-बड़े मतभेद होने पर भी बातचीत जारी रखें। आपसी मतभेद को मनभेद न बनने दें। 3। जितना हो सके सुनें। इससे हम ज्यादा-से-ज्यादा सीखेंगे और कम-से-कम चीजें मिस करेंगे। साथ ही, आपस में तकरार होने के चांस भी कम होंगे। 4। जब सामनेवाले का पारा हाई तो चुप रह जाना ही बेहतर है, चाहे सामनेवाला गलत ही क्यों न हो। बाद में जरूर अपनी बात को कायदे से सही शब्दों में सामने रखें। मन में बातों को दबाकर रखना भी सही नहीं है। 5। दूसरों पर अपनी पसंद-नापसंद न थोपें। जब खुद हम हमेशा दूसरों के मुताबिक नहीं चल सकते तो दूसरों से यह उम्मीद भी बेकार है। अपने दोस्तों, रिश्तेदारों को बदलने की कोशिश से रिश्तों में खटास के सिवा कुछ नहीं मिलेगा।


सेहत

1। हम पैसे कमाने की खातिर अपनी सेहत को नजरअंदाज करते जाते हैं और बाद में सेहत ठीक करने की कोशिश में बेतहाशा पैसे खर्च करते हैं। पर अक्सर इसमें नाकाम रहते हैं। सेहत को अपनी प्राथमिकताओं में रखें। 2। रोजाना आधे घंटे की सैर या एक्सरसाइज जरूर करें। योगासन, प्राणायाम और मेडिटेशन कर पाएं तो तन-मन दोनों दुरुस्त रहेंगे। 3। कुछ लोग खाने के लिए जीते हैं तो कुछ जीने के लिए खाते हैं। हमें इन दोनों के बीच का रास्ता निकालना चाहिए। खाने में मन न मारें। कुछ भी खा सकते हैं लेकिन लिमिट में। खाना सेहतमंद हो, यह जरूर ध्यान रखना चाहिए। 4। आराम करें। हफ्ते में कम-से-कम कुछ घंटे ऐसे हों, जब हम दिल-दिमाग से तनावरहित होकर सिर्फ और सिर्फ आराम करें। ये चंद घंटे हमारी जिंदगी में रौनक और जोश लौटा देंगे। जिन लोगों से प्यार करते हैं, जिनका साथ पसंद करते हैं, उनके साथ वक्त बिताएं। 5। शराब, तंबाकू, गुटके जैसी चीजों से दूर रखें। अगर कुछ बुरी आदतें हैं तो उन्हें छोड़ने की कोशिश करें। बुरी आदतों को छुड़ाना मुश्किल हो सकता है लेकिन नामुमकिन नहीं।


करियर

1। भेड़चाल में न चलें, न ही दूसरों को मोटी कमाई करते देख उसी दिशा में बढ़ने लगें। हमें कामयाबी उसी फील्ड में मिलती है, जिसमें महारत हासिल है और जिसे हम एंजॉय करते हैं। 2। अपने सबसे बड़े शौक को प्रफेशन के रूप में चुनें। कोई काम न करें, जिसमें दिलचस्पी न हो। मनपसंद काम चुनने से हम उसे एंजॉय करेंगे। इससे काम से होनेवाला स्ट्रेस आपसे दूर रहेगा। 3। अगर हम अपने काम में सौ फीसदी देते हैं तो हमारी कामयाबी तय है क्योंकि माकेर्ट में ऐसे लोग बहुत कम हैं। छोटे-से-छोटे काम में भी अपना दिल, दिमाग और ताकत लगा दें। 4। जो भी काम करें, उसमें अपनी छाप छोड़ें। काम सभी लोग करते हैं, लेकिन कुछ लोग उसके लिए जाने जाते हैं। लीक से हटकर काम करें। लीक पर चलेंगे तो वहीं पहुंचेंगे, जहां दूसरे लोग उस रास्ते पर चलकर पहुंचे हैं। 5। जिंदगी के आखिरी लम्हे तक सीखते रहें। जानकारी ही हमारी असली ताकत है। अपने फील्ड के बारे में खुद को अपडेट करते रहें। चाहे इंटरनेट से करें या प्रफेशन से जुड़ी नई किताबें पढ़ें।


मनी मंत्रा

1। पैसे से खुशियां नहीं खरीदी जा सकतीं लेकिन इससे जिंदगी आसान हो जाती है और बहुत-सी तकलीफें दूर हो सकती हैं। इसलिए फाइनैंशल सिक्युरिटी जरूरी है। 2। जितनी चादर हो, उतने पैर पसारने चाहिए, अब यह फंडा बदल गया है। अब पैर सिकोड़ने के बजाय चादर बढ़ाने पर जोर देना चाहिए, लेकिन इतना जोर न लगाएं कि चादर फट जाए। 3। इनकम बढ़ाने के लिए एक ही सोर्स पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। कम-से-कम दो सोर्स होने चाहिए। अगर एक में दिक्कत हो तो दूसरा चलता रहे। लेकिन नया सोर्स बनने पर ही पुराने को छोड़ने की सोचें। 4। बचत को लेकर संतुलित नजरिया अपनाएं। बचत इतनी ज्यादा न करें कि आनेवाले कल को संवारने के चक्कर में अपने आज में तकलीफें उठाएं। न ही इतना ज्यादा खर्च करें कि आज की मौज-मस्ती के चक्कर में आनेवाले कल का ध्यान ही न रखें। 5। पैसे को मैनेज करें न कि पैसा आपको मैनेज करे। यानी अंधाधुंध पैसे कमाने के चक्कर में जिंदगी की बुनियादी खुशियों से दूर न हो जाएं। साथ ही, फटाफट पैसे कमाने के चक्कर में न पड़ें। ऐसे में अक्सर आदमी धोखा खाता है।


टाइम मैनेजमेंट

1। प्राथमिकता तय करें। ऐसा करते हुए हमेशा ध्यान रखें कि महत्वपूर्ण काम क्या है। कई बार हम लोग अर्जेन्ट और अहम काम के बीच फर्क नहीं कर पाते। अजेर्ंट काम (चाहे कम जरूरी ही क्यों न हो) अक्सर इस लिस्ट में ऊपर आ जाता है, जबकि अहम काम पीछे छूट जाता है। मसलन, अगर दांत का इलाज करना है तो हम अक्सर उसे टालते रहते हैं, जबकि वह बेहद जरूरी है पर अक्सर अजेंर्ट नहीं होता। 2। सही वक्त पर फैसले करना बेहद जरूरी है। किसी फैसले को लंबे वक्त तक टालने से बेहतर है, आर-पार करना। इससे स्थिति साफ हो जाती है। किसी फैसले को टालना कई बार उस फैसले को लेने से कहीं ज्यादा नुकसानदेह हो सकता है। 3। रोजाना सुबह उठकर उस दिन के कामों की लिस्ट बना लें। वक्त कम होने पर इनमें से गैरजरूरी को हटा दें, कम जरूरी को टाल दें और हो सके तो कामों को दूसरों को बांट दें, लेकिन उन पर थोपें नहीं। 4। लंबे वक्त से अटके पड़े काम के लिए रोजाना 10 मिनट का वक्त तय करें। इसी तरह ज्यादा वक्त खाने वाले कामों को भी छोटे-छोटे हिस्से में बांट लें और रोजाना थोड़ा-थोड़ा वक्त उसमें लगाएं। इससे देर से ही सही, काम पूरा हो जाएगा। 5। गौर करें कि हम अपना वक्त कैसे बिताते हैं। इसके लिए एक डायरी रखें और उसमें तीन दिन तक अपना रुटीन लिखें। इससे आप आसानी से पता लगा सकेंगे कि किस काम में आपका वक्त जाया हो रहा है।


लाइफ के टिप्स

- कभी खुशी और सुकून के पलों को कैनवस पर उतारने की सोची है। सबसे पहले मन में पेड़ के नीचे आराम से बैठकर नेचर को निहारते शख्स की इमेज मन में आती है। जाहिर है, जिंदगी की भागदौड़ के बीच कुछ वक्त अपने लिए निकालना बेहद जरूरी है। - अपनी जिंदगी को एक विस्तृत तस्वीर के रूप में देखें। सोचें कि हमारी जिंदगी के अलग-अलग क्षेत्र आपस में किस तरह जुड़ें हैं और पहचानें कि अगर एक में बदलाव होगा, तो दूसरों पर उसका क्या असर दिखेगा। - आज में जीएं। वर्तमान क्षण और आसपास की खूबसूरती को जीएं। अगर यह स्वीकार कर लें कि बदलाव शाश्वत है तो वर्तमान में जीने में मदद मिलती है। - अहम होना अच्छा है लेकिन अच्छा होना ज्यादा अहम है। - सफलता का कोई मंत्र नहीं है। यह कड़ी मेहनत, सही मौकों पर सही फैसले और तकदीर के मेलजोल से मिलती है। - कुछ लोग उन चीजों को देखते हैं, जो हैं और पूछे हैं क्यों, जबकि कुछ लोग ऐसी चीजों का सपना देखते हैं, जो कभी नहीं थीं और पूछते हैं - क्यों नहीं? - नया हमें लुभाता है लेकिन हम बदलाव से बचते हैं। नयापन लाने के लिए हमेशा बदलाव को तैयार रहना होगा। साभार नवभारत टाइम्‍स दिल्‍ली

Monday, September 21, 2009

पितृ पुरुष्‍ा के नाम पर पत्रकारिता संस्‍थान

--------- राजेन्द्र माथुर स्मृति पत्रकारिता संस्थान की स्थापना -------
स्वाधीन भारत में हिन्दी पत्रकारिता को स्थापित करने वाले दिवंगत पत्रकार स्वर्गीय राजेन्द्र माथुर का पूरा जीवन हिन्दी के लिये समर्पित रहा। मप्र के मालवा अंचल के इस प्रतिभावान पत्रकार ने यह प्रमाणित कर दिया कि ऊंचाई प्राप्त करने के लिये महानगर में पैदा होना आवश्यक नहीं है। नईदुनिया इंदौर से अपनी पत्रकारिता यात्रा आरंभ करने वाले श्री माथुर हिन्दी राष्ट्रीय दैनिक नवभारत टाइम्स के सम्पादक बने। आरंभ से अपनी आखिरी सांस तक ठेठ हिन्दी पत्रकार का चोला पहने रहे।
हिन्दी पत्रकारिता का विस्तार हुआ है और जब जब हिन्दी पत्रकारिता की बात आती है, रज्जू भइया का नाम जरूर स्मरण में आता है। दुर्भाग्य से आज वे हमारे बीच नहीं हैं। इससे भी बड़े दुर्भाग्य की बात यह है कि पत्रकारिता की शिक्षा पाने वाली नवागत पीढ़ी के अधिकांश लोगों को राजेन्द्र माथुर सरीखे पत्रकार के बारे में या तो जानकारी ही नहीं है अथवा है तो आधी-अधूरी। ऐसे में लगा कि आज और अभी समय रहते स्वर्गीय राजेन्द्र माथुर की पत्रकारिता को लेकर कोई पहल नहीं की गई तो इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा।
इसी सोच के साथ हम कुछ युवा साथियों जिनमें ज्यादतर स्वतंत्र पत्रकार हैं और जिनका जीवनयापन ही मुश्किल से चलता है ने मिलकर राजेन्द्र माथुर समृति पत्रकारिता संस्थान की स्थापना का सविनय पहल की है। आरंभिक दिनों में राजेन्द्र माथुर समृति व्याख्यान माला आरंभ किया जाएगा। प्रत्येक माह पत्रकारिता के समसामयिक विषयों पर सुधि पत्रकारों का व्याख्यान होगा।
फिलवक्त दो अक्टूबर 2009 को भोपाल में पहला व्याख्यान आयोजित करने का मन है। हम सब साथियों का आग्रह है कि रज्जू बाबू से संबंधित आपके पास संकलित/संग्रहित सामग्री भेजने के लिये मनोज कुमार संयोजक राजेन्द्र माथुर स्मृति पत्रकारिता संस्थान मो. 9300469918/ 9407514330 पर सम्पर्क किया जा सकता है। साभार मीडिया ख़बर

Sunday, September 20, 2009

अख़बार में कुछ काम की बातें

पिछले दिनों एक किताब पढ़ी है जिसमें न्‍यूजरूम, आइडिया और रिपोर्टिंग से संबंधित कुछ चीजें दी गई है। किताब अंगरेजी में है। मैं बहुत अच्‍छा अनुवादक तो नहीं हूं फिर सुधि मित्र काम की चीज समझ लेंगे। शेष हिस्‍सा समय-समय पर देता रहूंगा। फिलहाल इतने से काम चलाएं
अपना आइडिया लिखित में दें
रिपोर्टर को अपना आइडिया लिखित में देना चाहिए, चाहे वह स्‍पेशल स्‍टोरिज हो या महत्‍वपूर्ण ख़बर। एक छोटे से नोट में यह बताना चाहिए ख़बर का एंगल क्‍या होगा, इस ख़बर से कौन सा वर्ग प्रभावित होगा। पाठक के लिए ख़बर कितनी महत्‍वपूर्ण है। विजुअल (जैसे फोटो, ग्राफिक्‍स, कार्टुन, इलेस्‍ट्रेशन) क्‍या होगा, कितने दिन में ख़बर पूरी हो सकेगी, अगर ख़बर में कोई खर्च हो तो उसे भी दर्शाएं, आपकी ख़बर कितने दिन तक चलेगी अगर सीरिज चलाएं तो उल्‍लेख करें। कोशिश करें कि एक पैरा में ही यह सब हो जाएं। क्‍योंकि आपकी लंबी चौड़ी चिट्ठी पढ़ने का टाइम संपादक के पास नहीं होगा।
समय प्रधान ख़बरें दें
संपादक तब खुश होंगे जब उन्‍हें समय के अनुरूप ख़बरें मिलेंगी। मतलब ये कि दीवाली में पटाखों के बाजार पर अच्‍छी स्‍टोरी हो सकती है, लेकिन दीवाली के तीन महीने पहले ये स्‍टोरी लिखना कि पटाखों का बाजार सजने लगा है। समय के अनुसार ठीक नहीं है। भूत, भविष्‍य और वर्तमान को ध्‍यान में रखकर स्‍टोरी करनी चाहिए। किसी केस की सुनवाई के पहले केस से संबंधित कोई धमाकेदार ख़बर आपके अख़बार की बिक्री बढ़ा सकती है। जब कोई रिपोर्टर कोई एवरग्रीन स्‍टोरी पेश करता है तो उसे बताना चाहिए कि वह इस समय क्‍यों ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण है। अगर आपका कोई आइडिया रिजेक्‍ट कर दिया गया हो तो कभी उसे खत्‍म न समझें, हो सकता है समय के हिसाब से वो प्रांसगिक हो जाए। संपादक को बताएं कि किस तरह वह रिजेक्‍ट किया हुआ आइडिया अब एंगल बदलकर महत्‍वपूर्ण हो सकता है।
लोकल से नेशनल –
अगर आप लोकल ख़बर कर रहे तो उसे नेशनल सिचुएशन से कंपेयर करें। ठीक यही स्थिति नेशनल ख़बर के साथ भी होती है। जबकि कोई ख़बर नेशनल होती है तो देखें उसी एंगल पर लोकल क्‍या हो सकता है। उदाहरण के लिए जब छठे वेतनमान से केंद्रीय कर्मचारियों की पेंशन बढ़ने की ख़बर आई तो देखना चाहिए कि राज्‍य के कर्मचारियों की पेंशन कितनी बढ़ेगी फिर दोनों का तुलानात्‍मक अध्‍ययन करें। कुछ एक्‍सपर्ट्स से बात करें। बेहतरीन स्‍टोरी होगी। यही नियम अन्‍य ख़बरों के साथ लागू करें।
पुराना महत्‍वपूर्ण है
हमेशा अपने अख़बार को ध्‍यान से पढ़ना चाहिए, दूसरे अख़बार पढ़ने की भी आदत होना ही चाहिए। अगर कोई स्‍टोरी कर रहे हो। तो देखें आपके या अन्‍य अख़बार में कुछ सालों, महीनों दिनों पहले उस मुद्दे पर क्‍या छापा था। ये उल्‍लेख करें तब और अब सिचुएशन क्‍या है। किस तरह पूरी सिचुएशन बदल गई है। जारी…

Sunday, September 13, 2009

ब्‍लैक एंड व्‍हाइट ही ठीक था जनसत्‍ता



आज का जनसत्‍ता देखा अंतिम पेज खोला, तले में एक फोटो थी जिसके ऊपर ख़बर लिखी गई थी। इतना बुरा प्रयोग तो मैंने पहले कभी नहीं देखा। इतने डार्क फोटो के ऊपर ब्‍लैक टैक्‍सट। वैसे जनसत्‍ता के स्‍पोर्ट्स पेज पर अक्‍सर बहुत बुरे बुरे प्रयोग होते हैं। कभी इतना बुरा कट आउट बनता है कि क्रिकेटर की टोपी कट जाती है, तो कभी हाथ। रंगों के इस्‍तेमाल का तो पूछो मत। लाल पीले, इतने चटक रंग कि क्‍या कहने और रंगों के संयोजन की तो बात ही छोड़ो दो। फ्रंट पेज के बॉटम में ऐसा कलर बॉक्‍स फंसाते हैं कि लीड फोटो दब जाती है। रंगों का इतना बुरा इस्‍तेमाल शाम के अख़बार वाले भी नहीं करते। अगर जनसत्‍ता में ऑपरेटर पेज बनाते हैं तो इन रंगों का इस्‍तेमाल भी वहीं करते होंगे। अगर जनसत्‍ता में संपादकीय के लोग ही पेज बनाते हैं, तो ये बहुत बुरी बात है कि वे इस तरह रंगों का इस्‍तेमाल करते हैं। लेआउट की जनसत्‍ता में बात ही छोड़ो। इसलिए लगता है जब जनसत्‍ता ब्‍लैक एंड व्‍हाइट था तब ज्‍यादा ठीक था।

Saturday, September 12, 2009

टर्की में भी बेहतरीन पत्रकारिता

अभी तक तो अपन तो समझते थे कि हिंदुस्‍तान में ही अख़बार लेआउट को लेकर तड़क भड़क का प्रयोग करते हैं। जब आज टर्की के अख़बार देखे तो देखता रह गया। क्‍या अख़बार बनाते हैं, लेआउट तो शानदार है ही उसके साथ कंटेट भी जोरदार देते हैं। बिंदुवार ऐसी जानकारी जुटाते हैं क्‍या कहना। इस्‍तानबुल से निकलने वाला एक अख़बार है मिलियट देखों क्‍या ख़बर परोसी है। लीड ख़बर में ग्राफिक्‍स, इलेस्‍ट्रेशन, पाइंट्स सब कुछ जुटाए गए हैं। यहां के कुछ अख़बार फुल पेज बॉक्‍स का भी इस्‍तेमाल करते हैं।
हेडर नहीं ‘मिडर’
एक खास बात यहां के अख़बारों में हेडर नहीं ‘मिडर’ होता है। मतलब यहां के अख़बारों में हेडर फ्रंट पेज के बीचोबीच होता है। अगर नया आदमी अख़बार पढ़े तो समझे कोई हेडिंग होगी। सबह, ऑले, हबर तुर्क ऐसे अख़बार हैं जिनके बीच में अख़बार का नाम है। जहां हेडर होता है वहां लीड की हेडलाइन है। यहां अपने यहां जैसे ज्‍यादा ख़बरें तो नहीं भरी जातीं लेकिन अमेरिका और यूके जैसे एक ख़बर में फ्रंट पेज नहीं समेटा जाता है। चार पांच ख़बर होती है अमूमन सभी ख़बरों का अच्‍छे से ट्रीटमेंट किया जाता है (बुगन नाम का अख़बार देखें)