बुधवार, जून 24, 2009

मजा नहीं आया फादर्स डे में


स बार भी फादर्स डे आया साथ में वर्ल्‍ड म्‍यूजिक डे भी लाया। हमारे अधिकांश अख़बारों में वही घिसी-पिटी स्‍टोरीज थीं। चार-पांच पिताओं से बात, कि उन्‍हें कब अहसास हुआ वे पिता हैं। उन्‍हें पिता होने के कौन से पल अच्‍छे लगे। कुछ अख़बारों ने अपने सर्वे करा लिए। कुछ अख़बार म्‍यूजिक और फादर्स डे एक ही पेज पर कवर करने के चक्‍कर में किसी के भी साथ इंसाफ नहीं कर पाए। नईदुनिया का इंदौर संस्‍करण उनमें से एक था। भास्‍कर में भी कुछ खास नहीं हुआ। पत्रिका जयपुर ने जरूर सर्वे दिखा दिया कि कब पापा बनने का अहसास हुआ। टाइम्‍स ने हमेशा की तरह इस डे का विलायतीपन बताते हुए हाईप्रोफाइल और बॉलीवुड में पिता और बच्‍चों के रिश्‍ते को बताया। एचटी भी अमूमन इसी राह पर था। रविवार होने के कारण सप्‍लीमेंट भी फादर्स डे को समर्पित थे। लेकिन प्रभावशाली नहीं थे। हां हिंदी अखबार फादर्स डे पर वृद्धाश्रम में मजबूर पिताओं की स्‍टोरी करना नहीं भूले। फिर मैंने उस दिन के कुछ विदेशी अख़बार देखे। अधिकांश अख़बारों में पहले पेज पर फादर्स डे वाली ख़बर थी। जबकि हमारे यहां अंदर के सप्‍लीमेंट्स पर। हो सकता है पश्चिम डे है इसलिए वे लोग प्रथम पेज पर स्‍थान देते हैं। हमारे कुछ अख़बारों ने अच्‍छी स्‍टोरी की लेकिन ठीक से प्‍ले नहीं कर पाए। ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्‍योंकि इस प्रकार के पेजों को बनाने का अनुभव मेरे पास भी है। हमारे सामने भी वही समस्‍या होती थी। जो अन्‍य अख़बारों के सामने होती है, कि दूसरों से अलग हमारी स्‍टोरी कैसी हो। जब हम स्‍टोरी आइडिया तय करते थे, तब सोचते थे ये दूसरे अख़बारों से अलग होगा, होता भी था लेकिन लोकल लेवल पर। जब देशभर के अख़बार देखते थे तो निराश हो जाते थे। इस बार भी वही हुआ। लेकिन विदेश के कुछ अख़बारों में काबिले तारीफ कवरेज है। एक अख़बार में अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा का उनकी बेटी साशा के साथ फोटो प्रकाशित किया है। वो भी हेडर से उपर हेडलाइन के साथ। कवरेज तो प्रशंसनीय है ही, लेकिन जो लेआउट का प्रयोग फोटो के साथ है वो भी कम नहीं है। एक अख़बार ने ऐसे पिता की तस्‍वीर छापी है जो ए‍क दिन पहले ही पिता बना है और वो भी एक नहीं तीन बच्‍चों का। कहने का मतलब ये नहीं कि विदेशी अख़बार हमसे बहुत ज्‍यादा अच्‍छे हैं। ये बात सही है कि जो दौर आज हमारे यहां है वो दौर कभी वहां भी रहा होगा। फिर निरंतर विकास की प्रक्रिया से वे आज की स्थिति तक पहुंचे। अगर तुलानात्‍मक अध्‍ययन करें तो आजादी के सिर्फ छह दशक में हमारे अख़बारों ने जो प्रगति की वह बेमिसाल है। जबकि विदेश में अधिकांश अख़बार जो बड़े नाम हैं, उन्हें सौ साल से ज्‍यादा हो चुके हैं। हमारे यहां टाइम्‍स, हिंदू ही ऐसे अख़बार हैं जो सौ साल पुराने हैं। फिर हम विदेश के अख़बारों से अच्‍छी चीजें लेकर उसका भारतीयकरण कर अच्‍छे से प्रस्‍तुत कर सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसे महेश भट्ट की फिल्‍मों में होता है। लेकिन ख़बर हमारी होगी। फादर्स डे पर कुछ अच्‍छे पेज संग्रहित किए हैं। आशा है सुधि मित्रों के काम आएंगे।
पेज देखने के लिए राइट क्लिक करें और नई विंडो में पेज देखें

मंगलवार, जून 23, 2009

विष्णु नागर की 'गरमा-गरम' टिप्पणी

के नईदुनिया में विष्णु नागर की गरमा-गरम टिप्पणी छपी है। क्या जोरदार लिखा है विष्णुजी ने नाम में क्या ‘रक्खा’ है। वास्तव में नाम शब्द को लेकर इतनी गरम टिप्पणी कोई नहीं कर सकता है। उनकी कलम चली है दिल्ली के नाम बदलने की बहस पर। सुधि मित्रों के लिए बेहतर लेखन शैली का का इससे बेहतरीन नमूना शायद ही कहीं देखने को मिले। ऐसी टिप्žपणी लिखने के लिए विष्णुजी को बधाई।


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नाम में क्या रक्खा है?
विष्णु नागर


शेक्सपियर ने सही कहा है कि नाम में क्या रक्खा है? अब हमें ही लो। हमारा नाम विष्णु है। किसी को विष्णु कहने में दिक्कत होती है, तो वह बिस्नु कह देता है। विष्णु प्रभाकरजी के जीवित रहते कुछ ऐसे महानुभाव भी थे, जो हमें गलती से विष्णु प्रभाकर समझकर फोन कर देते थे। अब हमें तमाम लोग अर्थशास्त्री विष्णुदत्त नागर समझने की गलती किया करते हैं तो हम इनका क्या करें और हमारा नाम जिन भगवान के नाम पर है, उनके तो एक भी गुण, एक भी लक्षण हममें नहीं हैं। वे तो शेषशायी हैं। समुद्र में शेष नाग के फन के नीचे विश्राम किया करते हैं। लक्ष्मी उनके चरण दबाती रहती हैं। जहाँ तक अपना सवाल है जिस साँप का जहरीला दाँत निकाला जा चुका है, वह भी अगर फुफकार दे तो अपन दो कदम पीछे हट जाते हैं। विश्राम की तो छोड़िए हम विश्राम करने का सपना भी अगर आ जाए तो हम पसीना-पसीना हो जाएँ और रातभर फिर नींद न आए! और जहाँ तक समुद्र में विश्राम करने का प्रश्न है, तो हमारे लिए तो घर ही बहुत है। इस देश में कहने को अपना एक घर है, यही क्या कम है? पैर दबवाने की हमें आदत नहीं और हमारी लक्ष्मीजी को इतनी फुर्सत भी नहीं कि हमसे कहें, लाओजी, आपके पैर दबा दूँ! ईश्वर हम हैं नहीं, यहाँ तक कि ईश्वर में हमारा विश्वास तक नहीं है! तो हमारा नाम जरूर है विष्णु, लेकिन दूर-दूर तक हम विष्णु नहीं। लेकिन नाम यह है तो है! इसी तरह हमारे शहर दिल्ली को कोई देहली कहता है, कोई डेल्ही और कोई दिल्ली। अब कोई कहे कि नहीं जी इसका नाम तो सिर्फ एक ही रख दो- दिल्ली तो इसका क्या तुक है? जिसे जो कहना होगा, वही इसे कहेगा। उससे देहली या डेल्ही की बजाय दिल्ली लिखवाना चाहोगे तो वह लिख देगा। लेकिन इससे किसी को क्या लड्डू मिलेगा? इसलिए जो चल रहा है, चलने दो। जो नहीं चलना चाहिए, जब वह भी आराम से चल रहा है तो जो चलने योग्य है, उसे तो चलने दो!


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गुरुवार, जून 18, 2009

हेडर : अमेरिका में और हमारे यहां

ब कभी आपके अख़बार का हेडर बदलता है, तो समझ जाते हैं कि कोई विशेष दिन है आज। हमारे यहां अख़बार का हेडर विशेष मौकों पर ही बदला जाता है। आमतौर पर संपादक हेडर से प्रयोग करने से बचते हैं। खासतौर से हिंदी अख़बार के संपादक। उनका मानना होता है हेडर ही अख़बार की पहचान है। इसमें कोई दो राय नहीं, लेकिन अमेरिका के अधिकांश अख़बार न्‍यूयार्क टाइम्‍स,वॉल स्‍ट्रीट जरनल और वॉशिंगटन पोस्‍ट को छोड़कर रोजाना हेडर से प्रयोग नहीं करते। लेकिन अमेरिका का हर अख़बार हेडर के साथ प्रयोग करता है, और वे अख़बार बेहद खूबसूरत बनते हैं, उनका लेआउट देखते ही बनता है। हमारे देश में दीवाली, दशहरे, होली या फिर चुनाव पर ही हेडर बदला जाता है। एक मौका और आता है जब अख़बार अपना हेडर बदलता है वो है अख़बार की वर्षगांठ। अमेरिका के अख़बार हेडर के साथ ख़बरों को प्रयोग में लाते हैं। वे विंडो या पैनल बनाते हैं, ख़बर देते हैं, बताते हैं अंदर क्‍या देखिए वो भी 36 से 50 पाइंट तक। आप सोचकर अचरच में जरूर पड़ जाएंगे कि हमारे यहां तो 50 पाइंट में सेकेंड लीड का शीर्षक दिया जाता है। इस मामले में अंगरेजी अख़बार थोड़े से आगे हैं। वे भी तब प्रयोग करते हैं जब सेंसेक्‍स गिरता या बढ़ता है। वरना अपनी रूढि़यों पर अड़े रहते हैं। लेकिन इस मामले में एक अख़बार है जिसने ये मिथक तोड़ने की कोशिश की है, वो है इकनॉमिक्‍स टाइम्‍स जो हर दूसरे-तीसरे दिन कुछ न कुछ प्रयोग करता है। अमेरिका के अख़बारों में पहले पेज में हेडर पर ही अधिकांश सामग्री परोस दी जाती है। मतलब ये है कि विंडो लगाकर बता दिया जाता है कि आज के अख़बार में क्‍या-क्‍या है। जबकि हमारे यहां के अख़बारों में दो विंडो होती है जिसमें एक स्‍पोर्ट्स (स्‍पोर्ट्स का मतलब क्रिकेट से है) की विंडो होती है। दूसरी विंडो में कोई ग्‍लैमर ख़बर या किसी राजनीतिज्ञ की तस्‍वीर लगाकर विंडो बना देते हैं। वहीं हमारे अख़बारों शुरू के कॉलम में छोटी-छोटी ख़बरें होती है। जिसे हम न्‍यूज डाइजेस्‍ट, न्‍यूज फ्लैश, शार्ट स्‍टोरी, सार समाचार, न्‍यूज ब्रीफ कहते हैं। लेकिन वहां के अख़बारों में पहले कॉलम में ख़बर होती है। वे हेडर को प्रयोग में लाते हैं इन सब ख़बरों को देने के लिए।
जो तस्‍वीर दे रखी है उसे बड़ा देखने के लिए राइट क्लिक कर नई विंडो में देख सकते हैं
जो तस्‍वीर दी उनके ऑरिजल पेज भी मेरे पास हैं। अगर किसी मित्र का देखना हो तो मुझे मेरे ई मेल पर ख़बर कर दे मैं उसे भेज दूंगा।
dharmendrabchouhan@gmail.com

बुधवार, जून 17, 2009

घमंड से भरा हुआ टाइम्‍स का माफीनामा

ये लो अहमदाबाद टाइम्‍स ऑफ इंडिया का माफीनामा भी आ गया। वो भी पूरा दो लाइन का। समझ नहीं आता अंगरेजी में हर बात छोटी क्‍यों होती है। ये माफीनामा भी ठीक वैसा ही जैसे आज के युवा किसी बुजुर्ग से टकराते हैं, उन्‍हें गिराते हैं और कहते हैं सॉरी। सो टाइम्‍स ने भी आपसे कह दिया सॉरी रीडर। लेकिन इतनी बड़ी गलती का इतना सा माफीनामा, बहुत ही हास्‍यास्‍यपद है। अपने क्‍लासीफाइड का रेट बढ़ाते हैं, तो बड़ा सा विज्ञापन देते हैं। कोई ख़बर का असर हो जाए, तो टाइम्‍स इम्‍पेक्‍ट मारकर लंबा सा कलर बॉक्‍स बना देते हैं। टाइम्‍स अपने बड़े होने का दावा करता है लेकिन उसमें बड़प्‍पन नहीं है। टाइम्‍स का दो लाइन का माफीनामा भी घमंड से भरा हुआ ।

▐ एक संपादकीय पेज दो दिन – अहमदाबाद टाइम्स ऑफ इंडिया से हुई एक बड़ी चूक ▐


सू रत में चलती कार में एक किशोरी से तीन युवकों द्वारा कथित तौर पर बलात्कार किए जाने की घटना के विरोध में बंद के दौरान हुई हिंसा की तस्‍वीरें देखने पर वो ख़बर विस्‍तार से पढ़नी चाही। गुजराती तो आती नहीं थी हिंदी के अख़बारों के ईपेपर नहीं मिले सो सूरत का टाइम्‍स ऑफ इंडिया संस्करण खोजा लेकिन नहीं मिला। शायद ईपेपर उपलब्‍ध नहीं है, सो अहमदाबाद संस्करण ही खोल लिया। पहले पेज पर पूरी ख़बर बिछी थी। अंदर के पेज भी देख लिए। संपादकीय पेज पर भी नज़र मार ली। दिल्‍ली संस्‍करण से यह पेज अलग था। लेखों में भी अंतर था। सो उत्‍सुकतावश एक दिन पहले (15 जून) का संपादकीय पेज भी देखा। जो १५ पर था वही 16 पर भी था। मैंने सोचा तकनीकी गलती है शायद अपडेट नहीं हुआ होगा। लेकिन जब नज़र तारीख पर गई तो पता चला उस पर 15 जून 2009 अहमदाबाद लिखा था। फिर दिमाग गया कि ईपेपर डालने वालों से तारीख में गलती हो गई होगी। लेकिन असल में वहां एक ही पेज दो अलग-अलग तारीखों के नाम से छपा है। टाइम्‍स जैसे ग्रुप की ऐसी गलती देखकर बहुत अचरच हुआ। लेकिन गलती तो हो गई। एक बात समझ नहीं आती कि वो पेज सामान्‍यत: एक सीनियर न्‍यूज़ एडिटर के अंडर में होता है। वो ऐसी गलती कैसे कर सकता है। फिर पेज दूसरे संपादकीय सहयोगियों की नज़रों से भी तो गुजरा होगा। संपादक ने भी एक बार देखा तो होगा या‍ फिर अहमदाबाद का संपादक संपादकीय पेज पढ़ता ही नहीं। फिर प्‍लांट पर पेज चेक करने के लिए एक संपादकीय का साथी होगा, वो तो सारे पेज जांचता है। क्‍या उसे याद नहीं आया कि यही पेज उसने एक दिन पहले भी देखा था। ये दोबारा कैसे छप गया। लेकिन इतने बड़े ग्रुप के इतने बड़े संस्‍करण में एक महत्‍वपूर्ण पेज जो किसी अख़बार का आईना होता है दोबारा छप गया। यदि कोई ये कहे कि ये तकनीकी गलती थी तो सरासर गलत होगा क्‍योंकि तकनीकी गलती में तारीख अपडेट नहीं होती। हालांकि क्‍वार्क जिसमें अख़बार बनता है वो अपडेट तारीख पेज पर दिखता है। लेकिन उसे चेक जरूर किया जाता है। इसलिए यह कोई तकनीकी नहीं मानवीय गलती है। एक खबर दो पेजों पर छपी तो देखी थी लेकिन पूरा पेज छपने का ये दूसरा मामला मैंने आज देखा है। पहला देश के एक बड़े अख़बार में छपा था। सौभाग्‍य से वह पेज ख़बरों का न होकर विज्ञापनों का था। फिर भी वह अख़बार माफी मांगकर बच गया था। लेकिन टाइम्‍स की इस अक्षम्‍य गलती को रीडर माफ करेगा या नहीं ये तो नहीं पता लेकिन टाइम्‍स को इसके लिए रीडर्स से माफी जरूर मांगनी चाहिए। टाइम्‍स के पेज देखने के लिए राइट क्लिक कर नई विंडो में देख सकते हैं

मंगलवार, जून 16, 2009

एडमिशन से पहले एक नज़र इधर

दिनों एडमिशन का सीजन चल रहा है। हर अख़बार एडमिशन पर पेज निकाल रहा है। कोई मिशन एडमिशन निकाल रहा है तो कोई मिशन ग्रेजुएशन तो कोई क्‍या। नवभारत टाइम्‍स दिल्‍ली ने रविवार को जस्‍ट जिंदगी नाम से एक पेज़ निकाला है जिसमें यूनिवर्सिटीज और कॉलेजों के फर्जीवाड़े की जानकारी दी है। कुल मिलाकर पेज काफी इंफर्मेटिव है। नवभारत टाइम्‍स का ईपेपर नहीं होता इसलिए आपको पेज नहीं दे सकता। फिर भी उसका कंटेंट जरूर जुटा कर दे रहा हूं। ये उन मित्रों के काम आएगा जो इन दिनों कहीं एडमिशन लेना चाह रहे हैं या उन अभिभावकों के लिए श्रेयस्‍कर होगा, जो अपने बच्‍चों के एडमिशन की कवायद में जुटे हैं। साथ ही अपने मीडिया से जुड़े साथियों के लिए भी ख़बरों के संदर्भ में ये रपट मददगार होगी।
यूनिवर्सिटीज के फर्जीवाड़े से कैसे बचें?
जून - जुलाई का महीना , एडमिशन की मशक्कत के नाम होता है। प्रफेशनल कोर्स करें , या डिस्टंस एजुकेशन के जरिए करियर को संवारें हर स्टूडंट को यही चिंता रहती है। इसके साथ ही हाई क्लास एजुकेशन का दावा करने वाला तमाम इंस्टिट्यूट्स और यूनिवर्सिटीज के ऐड भी लुभाने के लिए सामने आने लगते हैं। डीम्ड यूनिवर्सिटीज और विदेशी यूनिवर्सिटीज के नाम पर चलते फर्जीवाड़े के बीच सभी कहते हैं कि एडमिशन लेने से पहले सावधानी बरतें , लेकिन इस सलाह के आगे सावधानी बरतने के तौर - तरीकों के बारे में कोई नहीं बताता। जस्ट जिंदगी में हम बता रहे हैं हायर एजुकेशन से जुड़ी तमाम नियामक संस्थाओं के नियम - कायदों , हेल्पलाइन नंबर और एडमिशन लेने से पहले बरती जाने वाली सावधानियों के बारे में।
कैसी कैसी यूनिवर्सिटी
सेंट्रल यूनिवर्सिटी : संसद के ऐक्ट के तहत बनाई गई देश में कुल 30 सेंट्रल यूनिवर्सिटी हैं। ये सभी मानव संसाधन विकास ( एचआरडी ) मंत्रालय के तहत आती हैं। इस यूनिवर्सिटीज को ज्यादा फंड आवंटित होता है , इसलिए इनमें दूसरी यूनिवर्सिटीज के मुकाबले सुविधाएं भी बेहतर होती हैं। 2009 में 15 यूनिवर्सिटीज को सेंट्रल यूनिवर्सिटीज का दर्जा दिया गया। कुछ प्रमुख सेंट्रलयूनिवर्सिटी डीयू , जेएनयू , इलाहाबाद यूनिवर्सिटी और बीएचयू हैं।
स्टेट यूनिवर्सिटी : राज्यों की विधानसभा ऐक्ट पारित कर स्टेट यूनिवर्सिटी बनाती है। देश में कुल 251 स्टेट यूनिवर्सिटी हैं। इनमें से केवल 123 यूनिवर्सिटी को ही यूजीसी द्वारा बजट मिलता है। यूनिवर्सिटी ऑफ कोलकता , यूनिवर्सिटी ऑफ मद्रास और यूनिवर्सिटी ऑफ मुंबई देश की सबसे पुरानी स्टेट यूनिवर्सिटीज हैं।
डीम्ड यूनिवर्सिटी : यूनिवर्सिटीज के अलावा उच्च शिक्षा से जुड़े दूसरे इंस्टिट्यूट्स को यूजीसी की सलाह पर केंद्र सरकार डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा देती है। अमूमन यह दर्जा पाने के लिए संस्थान में शिक्षा का स्तर बहुत ऊंचा होना जरूरी माना जाता है। इस तरह की यूनिवर्सिटी का स्टेटस बाकी यूनिवर्सिटी की तरह ही होता है , लेकिन इन्हें स्वायत्तता अधिक हासिल होती है। ये न सिर्फ अपना कोर्स और सिलेबस खुद डिजाइन कर सकते हैं , बल्कि अपने एडमिशन और फीस संबंधी नियम भी बना सकते हैं। इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ माइंस ( धनबाद ) , इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस ( बंगलूरु ) कुछ जानी - मानी डीम्ड यूनिवर्सिटी हैं।
प्राइवट यूनिवर्सिटी : उच्च शिक्षा के ऐसे संस्थान , जिनकी स्थापना राज्य या केंद्र के कानून के तहत किसी स्पॉन्सरिंग बॉडी द्वारा की जाती है , प्राइवेट यूनिवर्सिटी कहलाते हैं। ऐसी यूनिवर्सिटीज के पास यूजीसी की मान्यता भी होती है , जिससे इनके द्वारा दी जा रही डिग्रियों को मान्यता मिलती है। पिलानी स्थित बिड़ला इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी एंड साइंस को इस कैटिगरी में रखा जा सकता है।
नोट : देश में कुल 123 डीम्ड यूनिवर्सिटी है। इनमें से 54 को पिछले पांच साल में यह दर्जा हासिल हुआ है। चूंकि इनमें से कई यूनिवर्सिटीज को मान्यता देने में पारदर्शी प्रक्रिया नहीं अपनाई गई , इसलिए इनकी मान्यता को लेकर हाल में विवाद उठ खड़ा हुआ है।
क्या है डीम्ड यूनिवर्सिटी ?
यूजीसी ऐक्ट के सेक्शन 3 के तहत केंद्र ऐसे संस्थानों को डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा दे सकता है , जहां किसी खास फील्ड में शिक्षा का स्तर बहुत ऊंचा है , लेकिन उन्हें यूनिवर्सिटी का दर्जा हासिल नहीं है।
कैसे बनती हैं डीम्ड यूनिवर्सिटी ?
इस दर्जे को पाने का इच्छुक कोई भी इंस्टिट्यूट यूजीसी और एचआरडी मिनिस्ट्री को अप्लाई करता है। डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा देने के लिए यूजीसी ने कुछ मानक निर्धारित कर रखे हैं। एप्लीकेशन आने पर यूजीसी की एक टीम संबंधित इंस्टिट्यूट का दौरा करती है। मानक पर खरे उतरने वाले इंस्टिट्यूट को डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा देने के लिए यह कमिटी सिफारिश करती है। इसी के आधार पर डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा दिया जाता है।
क्या हैं मानक ?
- बहुत अच्छा अकादमिक स्तर
- एप्लीकेशन ओरिएंटेड प्रोग्राम चलाने की क्षमता
- 10 साल से ज्यादा समय से संचालित ( कुछ मामलों में इस नियम में छूट दी जा सकती है , ऐसी स्थिति में प्रोविजिनिल मान्यता दी जा सकती है। हर पांच साल के बाद इसका रिव्यू यूजीसी द्वारा किया जाता है। )
यूनिवर्सिटी और डीम्ड यूनिवर्सिटी में अंतर
संसद द्वारा बनाई गई यूनिवर्सिटी ही दूसरे कॉलिज और इंस्टिट्यूट को कोर्स चलाने के लिए खुद से संबद्ध कर मान्यता दे सकती हैं। डीम्ड यूनिवर्सिटी को मेन कैंपस के अलावा दूसरे किसी कैंपस या संस्थान में कोर्स चलाने के लिए कुछ शर्तों को पूरा करना होता है। हालांकि इन यूनिवर्सिटीज को यूजीसी से फंड मिलता है , लेकिन अकादमिक स्तर और फीस को लेकर राज्य सरकारें इन पर लगाम नहीं कस सकतीं क्योंकि इन्हें संसद के ऐक्ट के द्वारा बनाया जाता है।
स्टार रैंकिंग
पिछले दशक में यूजीसी ने यूनिवर्सिटी में मौजूद सुविधाओं और आधारभूत ढांचे के आधार पर स्टार रैंकिंग की प्रक्रिया शुरू की थी। इस प्रोसेस में फाइव स्टार पाने वाली कुछ एक यूनिवर्सिटी ने बाद में तमाम ऐसे कोर्स शुरु कर लिए , जिनके लिए आधारभूत ढांचा और टीचिंग स्टाफ भी नहीं था। फाइव स्टार रैंकिंग वाली यूनिवर्सिटी के फेर में दूर - दराज के स्टूडंट्स ने इन कोसेर्स में एडमिशन ले लिया , लेकिन बाद में उन्हें कोर्स पूरा होने तक तमाम परेशानियों से दो - चार होना पड़ा। मसलन , बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी , झांसी ने पांच - छह साल पहले तमाम प्रफेशनल कोर्स शुरू किए थे , जिनमें दिल्ली और हरियाणा के स्टूडंट्स ने एडमिशन लिया। मगर बाद में उन्हें समझ आया कि इस चमकती यूनिवर्सिटी में उनके कोर्स में पांच या दस ही स्टूडंट हैं , जो सिर्फ एक टीचर के हवाले कर दिए गए हैं। उनकी क्लास भी लगातार एक जगह से दूसरी जगह शिफ्ट होती रही। इसलिए किसी भी यूनिवर्सिटी की रैंकिंग के दावे की परख वहां पढ़ चुके स्टूडंट्स और कोर्स स्पेसिफिक डिटेल्स मसलन , फैकल्टी में कौन है आदि की जानकारी करने के बाद ही एडमिशन लें।
सावधान - होशियार
- डीम्ड यूनिवर्सिटी सबसे ज्यादा गड़बड़ी दूसरी जगहों पर अपने कैंपस या स्टडी सेंटर खोलने में करते हैं। इसके अलावा बिना परमिशन या रिकगनीशन के नए डिपार्टमंट भी खोले जाते हैं। स्टूडंट्स को चाहिए कि अखबारों में किसी इंस्टिट्यूट का एफिलेशन या किसी कोर्स के बारे में पता करने के लिए यूजीसी , एआईसीटीसी और डीसीई के हेल्पलाइन पर कॉल करें। ये नंबर सोमवार से शुक्रवार तक सुबह 10.30 से शाम पांच बजे तक काम करते हैं।

यूजीसी हेल्पलाइन - पता यूनिवर्सिटी ग्रांट कमिशन , बहादुर शाह जफर मार्ग , नई दिल्ली , पिन 110002 , ईमेल : webmaster@ugc.ac.in , वेबसाइट : www.ugc.ac.in
फोन नंबर : 2323 2701, 2323 6735, 2323 9437, 2323 5733, 2323 7721, 2323 2317, 2323 4116, 2323 6351 एक्सटेंशन अगर यूजीसी से मान्यताप्राप्त कॉलिजों के बारे में पता करना हो - 414 अगर यूजीसी से मान्यताप्राप्त सेंट्रल , स्टेट और डीम्ड यूनिवर्सिटी के बारे में पता करना हो - 339 अगर यूजीसी से मान्यताप्राप्त डिग्री कोर्सों के बारे में पता करना हो - 317 यूजीसी के किसी भी नंबर पर फोन करें , फिर जो भी जानकारी चाहिए उस एक्सटेंशन नंबर को फोन पर निर्देश सुनने के बाद डायल करें। यह हेल्पलाइन नंबर सोमवार से शुक्रवार तक सुबह 10.30 से शाम 5 बजे तक काम करते हैं।
रिसेप्शन नंबर : 23239627
डिस्टंस एजुकेशन काउंसिल ( डीईसी )
- दूर - दराज के इलाकों में प्रफेशनल कोर्स चलाने के लिए जरूरी संख्या में शिक्षण संस्थान मौजूद नहीं हैं। इसके लिए भारत सरकार ने डिस्टंस एजुकेशन काउंसिल बनाई है। काउंसिल तमाम यूनिवर्सिटीज को एक निश्चित प्रक्रिया के तहत डिस्टंस एजुकेशन के लिए सेंटर स्थापित करने की अनुमति देती है। स्टूडंट् को चाहिए कि डिस्टंस एजुकेशन के लिए वे जिस संस्थान या जिस कोर्स में एडमिशन ले रहे हैं , उसकी प्रामाणिकता की जानकारी काउंसिल की वेबसाइट के जरिए कर लें। इस वेबसाइट पर उन तमाम संस्थानों और कोर्सों के नाम दिए गए हैं , जो डीईसी से मान्यता लिए बिना ही कोर्स चला रही हैं। साथ ही तमाम राज्यों की ओपन यूनिवर्सिटी और दूसरी यूनिवर्सिटीज के बारे में भी जानकारी दी गई है , जो इस तरह के कोर्स कराने में सक्षम हैं।

इंदिरा गांधी नैशनल ओपन यूनिवर्सिटी , मैदान गढ़ी , नई दिल्ली - 110068 वेबसाइट - www.dec.ac.in हेल्पलाइन नंबर - 011 - 2953 5934 , 2953 3471 , 2953 3340

ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन ( एआईसीटीई )
इसकी स्थापना 1945 में भारत में तकनीकी शिक्षा की गुणवत्ता पर नियंत्रण रखने के लिए की गई थी। तकनीकी शिक्षा के मामले में यह भारत की सर्वोच्च नियामक संस्था है। इस समय देश के 1346 एंजीनियरिंग कॉलिज एआईसीटीई से मान्यताप्राप्त हैं। आईआईटी और बिट्स पिलानी इस मामले में अपवाद हैं।
पता इंदिरा गांधी स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स , इंदप्रस्थ स्टेट , नई दिल्ली वेबसाइट - www.aicte.ernet.in

- एआईसीटीई की वेबसाइट पर सभी मान्यताप्राप्त और गैरमान्यताप्राप्त इंस्टिट्यूट्स और कोर्सेज की जानकारी दी गई है। यहां पर हम स्टूडंट्स को एआईसीटीई के 8 रीजनल ऑफिस का पता , ईमेल आईडी और हेल्पलाइन फोन नंबर बता रहे हैं। आप जिस इंस्टिट्यूट और कोर्स में एडमिशन ले रहे हैं , उसके वेरिफिकेशन के लिए संबंधित रीजनल ऑफिस से संपर्क करें।

सेंट्रल रीजनल ऑफिस टैगोर हॉस्ल 2 , शामला हिल्स , भोपाल 462002 फोन 0755 2660065 ईमेलः cro_aicte@yahoo.com

वेस्टर्न रीजनल ऑफिस
दूसरा तल , इंडस्ट्रियल इंशुअरंस बिल्डिंग , वी . एन . रोड . चर्च गेट रेलवे स्टेशन के सामने , मुंबई 400 020 फोन 022 22851551 ईमेलः wro_aicte@yahoo.com wroaicte@yahoo.com

साउथ रीजनल ऑफिस हेल्थ सेंटर बिल्डिंग बैंगलुरू यूनिवर्सिटी कैंपस बेंगलुरु 560 009
फोन 080 22205979 ईमेलः aicteswro@vsnl.net

ईस्टर्न रीजनल ऑफिस एल . बी . ब्लॉक , सेक्टर 3 कॉलेज ऑफ लेदर टेक्नॉलजी कैंपस सॉल्ट लेक सिटी , कोलकाता 700 091 फोन 033 23357459

नॉर्थ वेस्टर्न रीजनल ऑफिस 1310, सेक्टर 42 बी चंडीगढ़ 160036 फोन 0172 2660179 ईमेलः aictenwro@sify.com

नॉर्दन रीजनल ऑफिस गवर्नमेंट पॉलिटेक्निक कैंपस , डायरेक्टरेट ऑफ टेक्निकल एजुकेशन , विकास नगर , कानपुर फोन 0512 2585012 , 2585014 ईमेलः aictenro@sancharnet.in

सदर्न रीजनल ऑफिस शास्त्री भवन 26 हैडोज रोड , चेन्नै 600 006 फोन 044 28279998
ईमेलः aictesouth@vsnl.com

विदेशी यूनिवर्सिटी की डिग्री बांटते इंस्टिट्यूट
इसी तरह किसी विदेशी यूनिवर्सिटी के साथ टाईअप करके कोर्स चला रहे इंस्टिट्यूट या कॉलिज की डिग्री की इंडिया में मान्यता है या नहीं , इसकी जानकारी भी यूजीसी की हेल्पलाइन से की जा सकती है। मसलन , मैनिजमंट गुरु अरिंदम चौधरी का कॉलिज आईआईपीएम इस समय एक कानूनी विवाद में पड़ा हुआ है। इसकी डिग्री को जिस विदेशी यूनिवर्सिटी के जरिए दिया जा रहा है , भारत में एकैडमिक रेगुलेशन से जुड़ी संस्थाएं उसे मान्यता नहीं देती हैं। जाहिर है कि ऐसे संस्थान में एडमिशन लेने से पहले यह जान लेना मुनासिब होगा कि स्टूडंट को जो डिग्री मिल रही है , उसका भारत में किसी ऐसे सरकारी पोस्ट या सरकारी संस्था में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता , जो मान्यताप्राप्त डिग्री या डिप्लोमा ही स्वीकार करते हैं। मुमकिन है कि इंडस्ट्री में उस इंस्टिट्यूट की इतनी प्रतिष्ठा हो कि सिर्फ वहां के कोर्स के नाम पर ही जॉब मिल जाए , लेकिन ऐसा प्राइवेट सेक्टर में ही मुमकिन होगा।
- साथ ही एजुकेशन लोन के लिए भी अब तमाम बैंक जिस इंस्टिट्यूट में एडमिशन लेने जा रहे हैं , उसके यूजीसी , एआईसीटीसी सर्टिफिकेशन का प्रूफ मांगती हैं।
- यूजीसी ने अपनी हालिया जांच में पाया है कि कई डीम्ड यूनिवर्सिटी दूसरी जगह स्टडी सेंटर खोलने या फिर नए डिपार्टमंट या इंस्टिट्यूट खोलने के लिए यूजीसी को एप्लिकेशन फाइल करते ही इस बारे में ऐड देना और एडमिशन लेना शुरू कर देते हैं। भले ही उनकी ऐप्लिकेशन यूजीसी या एचआरडी मिनिस्ट्री से अप्रूव हुई हो या नहीं।
किसी भी डीम्ड यूनिवर्सिटी को दूरस्थ शिक्षा ( डिस्टंस लर्निंग ) के तहत कोर्स शुरू करने के लिए कड़ी मानक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसके लिए डिस्टंस एडुकेशन काउंसिल नियामक बॉडी है। ऐसे में जब भी डिस्टंस एजुकेशन के तहत किसी कोर्स में दाखिला लें , काउंसिल की हेल्पलाइन नंबर पर फोन कर या मेल भेजकर यह सुनिश्चित कर लें कि यूनिवर्सिटी इस तरह के कोर्स या सेंटर चलाने के लिए ऑथॉराइज्ड है या नहीं।
- इसी तरह यूजीसी का नियम है कि डीम्ड यूनिवर्सिटी किसी कॉलिज को मान्यता नहीं दे सकती हैं। लेकिन कई कॉलिज किसी डीम्ड यूनिवर्सिटी से मान्यताप्राप्त होने का दावा करते हैं। चुनावों के दौरान केंद्र सरकार ने एक कानून बनाया जिसके तहत डीम्ड यूनिवर्सिटी को अपने नाम के साथ डीम्ड जोड़ने की बाध्यता खत्म हो गई। ऐसे में स्टूडंट्स के लिए यह जानकारी करना और भी मुश्किल है कि जिस यूनिवर्सिटी से एफिलेशन का कॉलिज या इंस्टिट्यूट दावा कर रहा है , वह किस कैटिगरी में आती है। यूजीसी ने अपनी वेबसाइट पर राज्यवार हर प्रदेश में स्थित डीम्ड यूनिवर्सिटी का विस्तृत ब्यौरा दिया है। उसमें यूनिवर्सिटी का नाम चेक किया जा सकता है।

- डीम्ड यूनिवर्सिटी के द्वारा तमाम जगह स्टूडंट सेंटर बनाए जा सकते हैं , लेकिन इन सेंटर्स का इस्तेमाल पढ़ाई करने या कोर्स चलाने के लिए नहीं बल्कि स्टूडंट्स को कोर्स के सिलसिले में सलाह देने और उनकी मदद करने के लिए ही किया जा सकता है।

2009 में यूजीसी द्वारा जारी की गई फर्जी यूनिवर्सिटी की लिस्ट
बिहार - मैथिली यूनिवर्सिटी , दरभंगा , बिहार
दिल्ली -वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय , वाराणसी ( यूपी ) , जगतपुरी , दिल्ली
कमर्शल यूनिवर्सिटी लिमिटेड , दरियागंज , दिल्ली
यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटी , दिल्ली
वोकेशनल यूनिवर्सिटी , दिल्ली
एडीआर सेंट्रिक जुडिशल यूनिवर्सिटी , एडीआर हाउस , 8 जे , गोपाल टावर , 25 राजेंद्र प्लेस , नई दिल्ली
इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस एंड एंजीनियरिंग , नई दिल्ली
कर्नाटक -बादागनवी सरकार वर्ल्ड ओपन यूनिवर्सिटी एजुकेशन सोसाइटी , गोकाक , बेलगांव , कर्नाटक
केरल -सेंट जॉन यूनिवर्सिटी , किशनट्टम , केरल
मध्य प्रदेश -केसरवानी विद्यापीठ , जबलपुर , मध्य प्रदेश
महाराष्ट्र -राजा अरेबिक यूनिवर्सिटी , नागपुर , मध्य प्रदेश
तमिलनाडु -डी . डी . बी . संस्कृत यूनिवर्सिटी , पुतुर , त्रिची , तमिलनाडु
वेस्ट बंगाल -इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव मेडिसिन , कोलकाता
यूपी - महिला ग्राम विद्यापीठ ( महिला विश्वविद्यालय ) , इलाहाबाद
इंडियन एजुकेशन काउंसिल ऑफ यूपी , लखनऊ
गांधी हिंदी विद्यापीठ , प्रयाग , इलाहाबाद
नैशनल यूनिवर्सिटी ऑफ इलेक्ट्रो कॉम्प्लेक्स होमियोपैथी , कानपुर
नेताजी सुभाष चंद्र बोस यूनिवर्सिटी , ओपन यूनिवर्सिटी , अचलतल , अलीगढ़
उत्तर प्रदेश विश्वविद्यालय , कोसीकला , मथुरा
महाराणा प्रताप शिक्षा निकेतन विश्वविद्यालय , प्रतापगढ़
इंद्रप्रस्थ शिक्षा परिषद , इंस्टिट्यूशनल एरिया , माकनपुर , नोएडा फेज 2
गुरुकुल विश्वविद्यालय , वृंदावन

नोट
भारतीय शिक्षा परिषद द्वारा दी जा रही बीएड और एमएड की डिग्री का मामला और इस संस्था की मान्यता का मामला फिलहाल कोर्ट में लंबित है।
इसी तरह से दिल्ली स्थित आईआईपीएम की डिग्री की मान्यता संबंधी मसला कोर्ट में लंबित है।
ऐसे एंजीनियरिंग और मैनिजमंट कॉलिज या इंस्टिट्यूट जो एआईसीटीई से मान्यता लिए बिना कोर्स चला रहे हैं :
एआईसीटीई के मुताबिक देश में कुल 137 ऐसे कॉलिज या इंस्टिट्यूट हैं , जो फर्जी कोर्स चला रहे हैं। इस संस्था की वेबसाइट पर इन सभी संस्थानों और इनमें चल रहे गैरमान्यताप्राप्त कोर्सेज का ब्यौरा दिया है। स्टूडंट ध्यान दें कि इनमें से कुछ इंस्टिट्यूट पूरी तरह फर्जी हैं , जबकि कुछ को मान्यता तो मिली है , लेकिन उन सभी कोर्सेज के लिए नहीं जिनका वे विज्ञापन में दावा करते हैं। जाहिर है कि एडमिशन के दौरान अगर कोई इंस्टिट्यूट दावा करे कि उन्हें एआईसीटीसी से मान्यता मिली है , तो वेबसाइट पर चेक करें कि जिस कोर्स में आप दाखिला ले रहे हैं , वह मान्यताप्राप्त है या नहीं।
समस्‍त जानकारी नवभारत टाइम्‍स से छात्रों के निहितार्थ साभार

गुरुवार, जून 11, 2009

टाइम्‍स के लिए ‘महान’ नहीं हबीब तनवीर



हबीब तनवीर, रंगमंच की पाठशाला जो अब बंद हो चुकी है। देशभर के अख़बारों ने तनवीर साहब को प्रथम पेज पर स्‍थान दिया लेकिन टाइम्‍स ऑफ इंडिया ऐसा अख़बार था जिसने न पहले पेज पर तनवीर साहब को स्‍थान दिया न ही दो या तीन पेज पर। टाइम्‍स ऑफ इंडिया के लिए छोटे-छोटे कपड़े पहनकर पेज थ्री पर छाने वाली शीतल मफतलाल ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण थी। इसके दिल्‍ली संस्‍करण में पेज नौ पर हबीब जी को जगह दी गई है वो भी बॉटम में। उस ख़बर में लिखा है One of India’s greatest
dramatists, Habib Tanvir died on Monday at the age of 85. एक तरफ महान कह रहे हो और दूसरी तरफ सम्‍मान नहीं दे रहे हो। टाइम्‍स ऑफ इंडिया के ही मुंबई संस्‍करण में और धमाल है। प्रथम पेज का आधा हिस्‍सा शीतल मफतलाल के नाम कर दिया गया है। मुंबई मायानगरी है। यहां कलाकारों का सम्‍मान होता है। फिर हबीब तनवीर ने तो बॉलीवुड के लिए भी काम किया है। उन्‍होंने फिल्‍मों की पटकथा, संवाद और गीत लिखे हैं। कुछ फिल्‍मों में तो अभिनय भी किया है। उनकी ताजा फिल्‍म ब्‍लैक एंड व्‍हाइट थी जो शो मैन सुभाष घई ने बनाई थी। खराब स्‍वास्‍थ्‍य के बावजूद भी हबीब तनवीर ने उसमें अभिनय किया था। तो मुंबई के टाइम्‍स ऑफ इंडिया ने इस महान कलाकार को प्रथम पेज के लायक क्यों नहीं समझा? मुंबई टाइम्‍स के चौथे पेज पर वही कॉपी बॉटम में चस्‍पा है। मित्रों को बता दूं कि मध्‍यप्रदेश के सभी अख़बारों ने हबीब तनवीर को प्रथम पेज पर जगह देने के साथ एक पूरा पेज विशेष सामग्री के साथ दिया है। चाहे फिर वह नईदुनिया, दैनिक भास्‍कर, पत्रिका या फिर दूसरे अख़बार। टाइम्स के मुंबई संस्‍करण में एक पूरा पेज दिया गया है शीतल मफतलाल पर। वह है पेज दो। यहां दो बातें हो सकती हैं या तो प्रथम पेज बनाने वालों का न्‍यूज़ सेंस कमजोर है (छोटा मुंह बड़ी बात भी हो सकती है पर ऐसा कहने को मजबूर हूं ) या फिर टाइम्‍स ने यह पॉलिसी बना रखी है कि हबीब तनवीर जैसे फक्‍कड़ नाटकार को नहीं छापेंगे। ऐसा फक्कड़ जिसने चरणदास चोर जैसा उत्क्रष्ट नाटक रचा और देश की सबसे पुरानी नाट्य संस्‍था बनाई (जो जल्दी ही अपने 50 साल पूरे करने वाली है)। ऐसे फक्‍कड़ को जगह नहीं देना जिसने यूरोप में दो साल तक नाट्य विधाओं का अध्‍ययन किया और वहां के लिए काम किया या फिर ऐसा आदमी जिसे भारत सरकार ने पद्भश्री, पद्म विभूषण दिया हो। टाइम्‍स ने यह ख़बर क्‍यों प्रथम पेज पर नहीं छापी मैं नहीं जानता लेकिन जब हॉकर ने अख़बार डाला तो मैंने टाइम्‍स इसी उम्मीद पर उठाया था कि हबीब तनवीर जैसे महान कलाकार की ख़बर प्र‍थम पेज पर होगी और कुछ दो चार कॉलम विशेष सामग्री भी होगी जिसे देने के लिए टाइम्‍स मशहूर है। लेकिन मेरा भ्रम टूट गया क्‍योंकि टाइम्‍स ने हबीब तनवीर को इस लायक नहीं समझा।
अगर इन पेजों को देखना या पढ़ना चाहते हैं राइट क्लिक कर दूसरी विंडो में ओपन कर सकते हैं।












सोमवार, जून 08, 2009

मुझे माफ कीजिएगा मित्रों


पहले तो अपने साथियों से क्षमा मांगना चाहता हूं। क्‍योंकि काफी दिनों तक अख़बार की बात से दूर रहा। मैंने अपनी पिछली पोस्‍ट 4 जुलाई 2008 को लिखी थी। इसके चार दिन बाद आठ जुलाई को मैंने इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया में कदम रखा। इलेक्‍ट्रॉनिक का काम सीखने में काफी समय खर्च हुआ। विधानसभा चुनाव फिर लोकसभा चुनाव आए इन्‍हें निपटाने का काम मिला। इसलिए कुछ नहीं लिख पाया। इसलिए सुधि मित्रों से क्षमा चाहता हूं। अब मित्रगण चाहे तो गरियायें या फिर क्षमा कर दें। अब पाबंदी से लिखूंगा । पिछली बार मेरी देरी से लिखने की आदत पर एक मित्र ने पाबंदी से लिखने की सलाह दी थी। मैं उस अनाम मित्र को विश्‍वास दिलाता हूं कि आगे से उन्‍हें कोई शिकायत का अवसर नहीं दूंगा।
धर्मेन्‍द्र चौहान