बुधवार, मार्च 31, 2010

आओ जानें अमेरिका के पुलित्‍ज़र पत्रकारिता पुरस्‍कार को

   इस साल के पुलित्‍ज़र पुरस्‍कारों की घोषणा 12 अप्रैल को     . 
रात को वॉल स्‍ट्रीट जर्नल के बारे में पढ़ रहा था। तो पता चला कि wsj को 5 Pulitzer prize मिल चुके हैं। फिर दिमाग का कीड़ा जाग उठा ये Pulitzer क्‍या है। दो तीन दोस्‍तों से पूछा। फिर सोचा क्‍यों न इसका पता लगाया ताकि अपने दोस्‍तों को भी पता चल जाए। सर्च मारा तो पता चला ये अमेरिका में बेहतरीन पत्रकारिता के लिए दिया जाने वाला पुरस्‍कार है, यहां के लोग इसे नोबेल से कम नहीं मानते। अपने देश में ऐसा विशेषतौर पर ऐसा कोई अवार्ड नहीं है जिसे पाकर कहें कि यह उस अख़बार के पत्रकार को उस ख़बर के लिए दिया गया है। हां पद्मश्री जरूर दिए जाते हैं लेकिन वे योगदान के लिए दिए जाते हैं न कि श्रेष्‍ठ काम के लिए। राज्‍यस्‍तर पर कई पत्रकारों के नाम पर पुरस्‍कार दिए जाते हैं लेकिन वे इतने लो‍कप्रिय नहीं जितना दुनिया में पु‍लित्‍ज़र प्राइज नहीं। पुलित्ज़र प्राइज कोलंबिया यूनिवर्सिटी के ही स्कूल ऑफ जर्नलिज्म द्वारा दिया जाता है। ये पुरस्कार जर्नलिज्म, साहित्यिक उपलब्धियों और संगीत के क्षेत्र में हर साल कुल 21 श्रेणियों में दिए जाते हैं। 14 पुरस्कार पत्रकारिता, 6 साहित्य व एक संगीत के क्षेत्र में दिया जाता है। इसके अलावा 4 फेलोशिप भी दी जाती है। यह पुरस्कार हंगेरियन-अमेरिकन जर्नलिस्ट व न्यूजपेपर पब्लिशर जोसेफ पुलित्ज़र (1847-1911) की स्मृति में शुरू किया गया था। जोसेफ पुलित्जर ने उस समय इसके लिए 5 लाख अमेरिकी डॉलर की राशि कोलंबिया यूनिवर्सिटी को दान में दी थी। उनकी वसीयत के एक हिस्से से 1912 में कोलंबिया यूनिवर्सिटी में स्कूल ऑफ जर्नलिज्म की स्थापना की गई। पहला पुलित्ज़र पुरस्कार 1917 में प्रदान किया गया। पुरस्कार विजेताओं का चयन एक स्वतंत्र बोर्ड करता है। पुलित्‍ज़र प्राइज जीतने वालों इंगलैंड में पैदा हुई और अमेरिका में रह रही भारतीय मूल की लेखिका झुम्‍पा लहिरी भी है। इसके अलावा बैंकॉक में रहने वाले पाकिस्‍तानी मूल के रायटर के फोटोग्राफर अद्रीस लतीफ को यह पुरस्कार दिया गया है। पुलित्‍ज़र की वेबसाइट के अनुसार इस साल के प्राइज की घोषणा 12 अप्रैल को होने वाली है।   

सोमवार, मार्च 29, 2010

अगर ख़बर सीधी की जगह ऐसे छप जाए तो


सोचिए अगर भारत के किसी भी भाषा के अख़बार सीधी ख़बरों के बीच ऐसी ख़बर छप जाए तो क्‍या होगा। कंप्‍यूटर ऑपरेटर, संपादक, उपसंपादक और न्‍यूजरूम प्रभारी की नौकरी चली जाएगी। लेकिन अमेरिका के एक अख़बार द रिपोर्टरने खाटी शब्‍दों में कहें तो सीधी ख़बरों के बीच आड़ी ख़बर लगा दी। आपको सुनकर हैरानी होगी कि ऐसा करने वाले को नौकरी से नहीं निकाला नहीं गया बल्कि अख़बार के एमडी से लेकर आलाअफसर तक ने उस शख्‍स को बधाई दी। एक अंगरेजी वेबसाइट के अनुसार द रिपोर्टरके जीएम और कार्यकारी संपादक Richard Roesgen इस पेज के छपने की कहानी यूं बताई। कॉपी एडिटर और प्रथम पेज के डिजाइनर Gary Clausius ने डेली मीटिंग के दौरान आइडिया दिया था कि पहले पेज पर हमें बाएं और दाएं पांच-छह कॉलम में ऐसी ख़बर लगानी चाहिए, जो सबसे अलग हो। फिर ये सुझाव एमडी  Mike Mentzer के पास गया। आप जानते हैं Mike Mentzer के मुंह से क्‍या निकला  “Cool, great idea, let’s do it.”
पांच साल पहले किया प्रयोग
एक ऐसा और अख़बार मिला जिसका नाम है the Des Moines Register जिसमें एक ग्राफिक्‍स आड़ा लगा हुआ है। लेकिन प्रयोग के मामले में the Des Moines Register अव्‍वल रहा है ये प्रयोग उसने पांच साल पहले किया था। भारतीय अख़बार भी इस मामले में आगे रहे हैं यहां दो चार साल पहले तक आड़े ही उल्‍टे विज्ञापन भी छपते थे। ताकि लोग उन विज्ञापन को देखें।

रविवार, मार्च 28, 2010

देखें कैसे बनता है वॉल स्‍ट्रीट जर्नल (WSJ) में डॉटेड इलेस्‍ट्रेशन


दुनिया के सबसे बड़े अख़बारों में से एक वॉल स्‍ट्रीट जर्नल, इस अख़बार में हॉफ कॉलम या एक कॉलम में किसी व्‍यक्ति की तस्‍वीर की जगह कटआउट या लगाया जाता है। सीधे सीधे शब्‍दों में हाथ से बनाया हुआ डॉटेड इलेस्‍ट्रेशन। अपने डॉटेट कटआउट्स के लिए मशहूर वॉल स्‍ट्रीट जर्नल के बारे में जानते हैं। कैसे बनते हैं ये कटआउट्स। WSJ  में डॉटेड कटआउट लगाने का प्रचलन 1979 में शुरू हुआ था। इन कट आउट्स को चार आठ WSJ के आठ लोग मिलकर बनाते हैं इनमें चार स्‍टाफर हैं और चार फ्री लांसर।  एक कटआउट को बनने में दो से पांच घंटे लगते हैं। तो अब पता लगा कि आध कॉलम में लगने वाला एक कटआउट के लिए दो से पांच घंटे लगते हैं। जबकि भारत में दो सेमी की फोटो पलभर में लग जाती है। एक कटआउट से तीन बाई पांच इंच का बनाया जाता है जिसे छोटा करके हॉफ कॉलम में छापा जाता है। ये सभी आर्टिस्‍ट रोज रोज दफ्तर नहीं जाते बल्कि अपने घर पर बैठे बैठे ही काम करते हैं। इन्‍हें रोज अपना असाइमेंट ईमेल के जरिए मिलता है। और वो तस्‍वीर भी मेल कर दी जाती है जिसका कटआउट बनाना है। अपना काम होने के बाद ये आर्टिस्‍ट कटआउट को ईमेल से ही WSJ के दफ्तर भेज देते हैं। Hai Knafo WSJ के पहले इलेस्‍ट्रेटर हैं और वो पिछले 27 सालों से WSJ के लिए डॉटेट कटआउट बना रहे हैं।

 
Wall Street Journal के सीनियर इलेस्‍ट्रेटर  Hai Knafo. जो दो दशक से भी ज्‍यादा समय से जुडे् हैं। 
 
Wall Street Journal की इलेक्‍ट्रेटर Noli Novak। 
ये जानकारी WSJ की वेबसाइट पर दी है तस्‍वीरें भी वहीं से साभार हैं। 


नीचे दी गई लिंक पर राइट क्लिक कीजिए और देखिए कैसे काम होता है वॉल स्‍ट्रीट जर्नल के लिए डॉटेड कटआउट बनाने का 




शुक्रवार, मार्च 26, 2010

स्‍पोर्ट्स के पेजों के लेआउट्स की दूसरी किस्‍त



पेज खोलने के लिए राइट क्लिक करें और नई विंडो में इमेज खोलें 


गुरुवार, मार्च 25, 2010

स्‍पोर्ट्स के लिए अच्‍छे लेआउट

कुछ स्‍पोर्ट्स के पेज अच्‍छे लेआउट मिले हैं। हालांकि अधिकांश पेज सेंट्रल स्‍प्रेड या हॉरिजंटल स्‍टाइल में बनाए गए हैं। हमारे यहां इस तरह कम पेज बनाए जाते थे फिर भी आइडिया लेकर एक पैकेज तो बनाया ही जा सकता है। इसी प्रकृति के दो तीन दूसरे पेज भी हैं दोस्‍तों के काम आएंगे। 

रविवार, मार्च 21, 2010

लुधियाना की सीनियर रिपोर्टर पूनम सपरा का निधन



पूनम सपरा जब पहली बार नाम पढ़ा तो लगा कोई पंजाबी मुटियार होगी। जब मिला तो बिलकुल काउ गर्ल की स्‍टाइलवाली डेशिंग लेडी और काम में तेजतर्रार। वे काफी प्रोफेशनल थीं। जब उन्‍हें मेरी टीम में शामिल किया गया और हैल्‍थ संबंधी स्‍टोरी करने की जिम्‍मेदारी दी गई थी। पूछने की देर थी पूनमजी आज क्‍या। स्‍टोरिज की झड़ी लग गई। काम चलता रहा। फिर मैंने लुधियाना छोड़ दिया, कुछ दिनों बात पता चला वो वापस अपने पुराने संस्‍थान में लौट गईं। हां एक बार और का और किस्‍सा सुनाता हूं। वो हमारे सेक्‍शन में नई आई थीं उन्‍हें मुख्‍य रिपोर्टिंग से हमारी सेक्‍शन में भेजा गया था। डेस्‍क की गलती से उनका सरनेम गलत चला गया था। मैंने सुबह अख़बार पढ़ा सेक्‍शन का इंचार्ज होने के नाते बहुत गिल्‍टी लगा। लगा सुबह के आठ बज रहे हैं अभी तक पूनमजी का फोन नहीं आया कि नाम गलत छप गया। जब दफ्तर पहुंचा तो मुस्‍कराती हुई बोली धर्मेन्‍द्रजी आप मेरा नाम गलत छप गया। मैंने कहा देखता हूं किसकी गलती है लेकिन मैं माफी चाहता हूं आगे से ऐसी गलती नहीं होगी। वो पूनमजी थीं पंजाबी स्‍टाइल में बोली ‘कोईनी कोईनी होता है’। आज दोस्‍त अबरार खान का फोन आया कि संभवत: रात को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हुआ है। सुबह जब उनके पति ने उन्‍हें जगाया तो वे मृत पड़ी हुई थीं। पूनमजी आप बहुत याद आओगे।

अख़बार उल्‍टा पकड़ लिया अतिथि संपादक ने




आजकल टाइम्‍स ऑफ इंडिया ने एक नया अख़बार शुरू किया है ‘द स्‍पीकिंग ट्री’। एक रुपये कीमत का ये अख़बार हर रविवार को टाइम्‍स के रेगुलर संस्‍करण के साथ मुफ्त में बांटा जा रहा है। इस सप्‍ताह इस के अतिथि संपादक श्रीश्री रविशंकर हैं। उनके आइडियाज ही इस संस्‍करण में इस्‍तेमाल किए हैं। अतिथि संपादक ने अपने अख़बार का विमोचन किया है लेकिन अख़बार उल्‍टा पकड़ा है। और भूलवश वो यह फोटो भी छप गया है। वैसे जिस फोटो में अख़बार सीधा पकड़ा हो वो भी छापा जा सकता है।



शनिवार, मार्च 20, 2010

फिर पुरानी ख़बरें नए लेआउट और नए नाम के साथ

आज ही टाइम्‍स का क्रिस्‍ट संस्‍करण आया है। कई स्‍टोरिज आईटी पर हैं लेकिन काफी पुरानी हैं। कहने तो टाइम्‍स का ये संस्‍करण खास है लेकिन इसमें खास कुछ नहीं। एक कई साल पुरानी ख़बर भी है चैंटिंग युवाओं के दांपत्‍य जीवन खटास आ रही है। ये कोई नई ख़बर नहीं है ये बरसों पुरानी है। हालांकि रोज कोई न कोई न पुरानी ख़बर नए मसाले के साथ बिकती है। ये पकड़ में आ गई तो लो देख लो जी हमने भी तीन साल साल पहले ये ख़बर करवाई थी।
:- एक ख़बर फोटोशॉप पर भी है, फोटोशॉप साफ्टवेयर ने दुनिया बदल कर रखदी है गोरे को काला और काले को गोरा बना दिया जाता है। अरे भई इसमें क्‍या नया है वो भी अंगरेजी रीडर के लिए हिंदी का रीडर वो भी अपना पान वाला गल्‍ली मोहल्‍ले वाला हो तो बात समझ में आती है। लेकिन आजकल तो मोहल्‍ले के कम पढ़े लिखे लोग भी जानते  हैं कि कंप्‍यूटर से झूठी तस्‍वीर बनाई जा सकती है। फिर क्‍यों इतनी महत्‍वपूर्ण स्‍पेस खराब कर दी है। यार पूरे छह रुपये देते हैं नई ख़बर तो दो।