क्या कभी सप्ताह में एक बार हैल्थ पर अख़बार निकल सकता है। अगर नहीं तो तो ये देखिए इस विदेशी अख़बार को ये सप्ताह में एक बार हैल्थ बेस्ड होता है। इस अख़बार में हेडर से लेकर लीड ख़बर तक स्वास्थ्य से संबंधित होती है। बाकी ख़बर भी रहती हैं लेकिन अंदर के पेजों पर। हिंदुस्तान में इस तरह का सफल प्रयोग होना अभी बाकी है। वैसे इस तरह का प्रयोग एक बार नईदुनिया इंदौर ने किया था। जो अब बंद हो चुका है। नईदुनिया कुछ महीनों पहले तक हर सोमवार को पॉजिटिव अख़बार निकालता था। जिसे वह सकारात्मक सोमवार का नाम देता था। इस दिन नईदुनिया के प्रथम पेज पर सकारात्मक संदेश देने वाले फोटो से लेकर ख़बर तक सकारात्मक होती थी। सकारात्मक सोमवार की ख़बरें अंदर भी होती थी। नईदुनिया की मंशा इसको लेकर यह थी कि एक दिन ही सही पाठकों को पॉजिटिव ख़बरें तो मिलें, लेकिन इस समय ये प्रयोग सफल नहीं हो पाया, हो सकता है ये प्रयोग कुछ सालों बाद सफल हो जाए। हमारे यहां हर सप्ताह इस तरह का प्रयोग भले ही सफल न पाए, लेकिन बार-त्योहार, 15 अगस्त, 26 जनवरी, मां-बाप दिवस पर जो पेज होते वो हजम हो जाते हैं।
बुधवार, जुलाई 29, 2009
सप्ताह में एक बार हैल्थ पर अख़बार
क्या कभी सप्ताह में एक बार हैल्थ पर अख़बार निकल सकता है। अगर नहीं तो तो ये देखिए इस विदेशी अख़बार को ये सप्ताह में एक बार हैल्थ बेस्ड होता है। इस अख़बार में हेडर से लेकर लीड ख़बर तक स्वास्थ्य से संबंधित होती है। बाकी ख़बर भी रहती हैं लेकिन अंदर के पेजों पर। हिंदुस्तान में इस तरह का सफल प्रयोग होना अभी बाकी है। वैसे इस तरह का प्रयोग एक बार नईदुनिया इंदौर ने किया था। जो अब बंद हो चुका है। नईदुनिया कुछ महीनों पहले तक हर सोमवार को पॉजिटिव अख़बार निकालता था। जिसे वह सकारात्मक सोमवार का नाम देता था। इस दिन नईदुनिया के प्रथम पेज पर सकारात्मक संदेश देने वाले फोटो से लेकर ख़बर तक सकारात्मक होती थी। सकारात्मक सोमवार की ख़बरें अंदर भी होती थी। नईदुनिया की मंशा इसको लेकर यह थी कि एक दिन ही सही पाठकों को पॉजिटिव ख़बरें तो मिलें, लेकिन इस समय ये प्रयोग सफल नहीं हो पाया, हो सकता है ये प्रयोग कुछ सालों बाद सफल हो जाए। हमारे यहां हर सप्ताह इस तरह का प्रयोग भले ही सफल न पाए, लेकिन बार-त्योहार, 15 अगस्त, 26 जनवरी, मां-बाप दिवस पर जो पेज होते वो हजम हो जाते हैं।
मंगलवार, जुलाई 28, 2009
एनडीटीवी की ब्रेकिंग : ‘बहुत जरूरी न हो घर से न निकलें’
अब जरा गौर फरमाइए देश के सबसे प्रतिष्ठित ख़बरिया चैनल एनडीटीवी के न्यूज़ सेंस पर। उनके लिए ब्रेकिंग न्यूज़ का मतलब क्या है। वैसे हम अख़बार की बात करते हैं, लेकिन कभी-कभी टीवी भी देख लेते हैं। आज सुबह एनडीटीवी हिंदी पर दिल्ली में जलभराव की ख़बर आ रही थी। सबसे पहले ब्रेकिंग आई ‘बहुत जरूरी न हो घर से न निकलें’ समझ नहीं आया ये ब्रेकिंग न्यूज़ है, हिदायत है या सलाह। फिर ब्रेकिंग आई ‘ बाहर जाने से बचें-दिल्ली ट्रैफिक पुलिस’। तीसरी ब्रेकिंग थी एमसीडी को पानी हटाने का आदेश’ अरे भई एमसीडी पानी नहीं हटाएगी तो क्या फाइनेंस मिनिस्टरी हटाएगी। चौथी ब्रेकिंग न्यूज़ ‘ज्यादातर अंडरपास में पानी भरा’ इसमें नई बात क्या है, निचली जगह पर ही तो पानी भरेगा। क्या कभी किसी ऊंची जगह पर पानी ठहरते देखा है। लोग उदाहरण देते हैं एनडीटीवी में सबसे गंभीर पत्रकारिता होती है, सो आज टीवी चालू किया तो वो भी देख लिया। टीवी चैनलों ने ब्रेकिंग की हालत क्या कर दी है। ये चार तस्वीरें देखकर अंदाजा लगा सकते हैं।
बुधवार, जुलाई 22, 2009
मंगलवार, जुलाई 21, 2009
मैं पापा बन गया हूं
कुछ दिनों पहले (17 जुलाई ) मेरे घर में एक नन्ही परी ने जन्म लिया है। इसलिए ब्लॉग की दुनिया से थोड़ा दूर हूं, और कुछ समय के लिए दूर ही रहूंगा। ब्लॉगर बिरादरी इसके लिए मुझे क्षमा कर देंगी। दरअसल घर में जब से बेटी का जन्म हुआ है, कुछ काम में मन नहीं लगता। मैं हमेशा कहता हूं, दुनिया की दो अद्भूत चीजें हैं, एक अख़बार का बनना और दूसरा एक बच्चे का जन्म । अब इन दोनों चीजों का अनुभव हो चुका है। अगर तुलना करूं तो बेटी के होने का सुख अख़बार से कहीं ज्यादा है। पत्नी की डिलेवरी सीजेरियन से हुई है, इसलिए उसका भी ख्याल रखना है। इस बीच अख़बार की बात जारी रहेगी। dharmendrabchouhan@gmail.com
बुधवार, जुलाई 08, 2009
अख़बारों के पेज भर गया रे,,,बजट

रेल बजट आया और आम बजट भी आ गया। वित्त मंत्री की तरह अख़बारों में भी संशय रहा क्या छापे, क्या न छापे। कोई भी बजट को पकड़ नहीं पाया कि बजट में आखिर है क्या ? यह गरीबों के हित में है या नहीं, अमीरों को फायदा पहुंचा रहा है या नहीं। जितने अख़बार देखे उतने हेडिंग और इंट्रो नजर आए, बजट की समीक्षा नज़र आई। बिजनेस अख़बारों ने जरूर कुछ ठीक किया लेकिन आम आदमी के अख़बार सिवाय इलेशट्रेशन, ग्राफिक्स और फोटो इमेजिंग के अलावा कुछ नहीं मिला। अलबत्ता आम दिनों की ख़बरें जरूर इधर-उधर हो गईं।▐► टाइम्स ऑफ इंडिया
शुरुआत टाइम्स ऑफ इंडिया से ही करते हैं, विशेष वर्ग के इस अख़बार ने चौंकाने वाला काम किया है। आज के अख़बार में टाइम्स ने एक भीख मांगने वाली बच्ची की रोते हुए तस्वीर दिखाई। हमेशा अपने तामझाम के लिए मशहूर टाइम्स इतना सिंपल हो जाएगा सोचा न था। टाइम्स ने अपने बजट संस्करण के इंट्रो में भावुक होकर जिस लड़की का फोटो छापा है उसी को प्रतीक बताकर गरीब वर्ग का उत्थान कर देश को समृद्धि की ओर ले जाया जा सकता है। पूरे अख़बार में बजट ही बजट था, इतने बड़े शहर दिल्ली की ख़बर गायब हो गईं। समझ नहीं आया कि कितने लोग सिर्फ बजट पढ़ना चाहते हैं। एक पेज सिटी के लिए दिया उसमें भी लिख दिया है बियॉन्ड बजट। कुल मिलाकर बजट ही बजट है। स्पोर्ट्स के तीन पेजों में से एक महेंद्र धोनी के जन्मदिन पर समर्पित है दूसरा पेज रॉजर फेडरर के नाम है। बजट की ख़बरें खूब हैं लेकिन समझ से परे हैं। 38 पेज के अख़बार में हर आदमी हर ख़बर खोजने में मशक्कत कर रहा होगा। सभी संस्करणों में प्रथम पेज एक जैसा ही है।
▐► हिंदुस्तान टाइम्स
हिंदुस्तान टाइम्स ने प्रणब बेच रहे हैं साबुन की फैक्ट्री शीर्षक से लगाकर नीचे एक कार्टून लगाकर बताया है कि बड़ी-बड़ी कंपनियों के सीईओ के लिए क्या है, बैंकर के लिए क्या है, लैक्चरर के लिए क्या है, बस ये नहीं लिखा कि गरीब के लिए क्या है? ये इसलिए लिखना पड़ रहा है क्योंकि देश की आधी से ज्यादा आबादी गरीब है। शेष अंदर के पेजों पर भी बजट है। कार्टून इलेट्रेशन का प्रयोग कर रोचक बनाने की कोशिश की है। कुल मिलाकर कुछ खास नहीं है।
▐► दैनिक भास्कर
भास्कर ने अंगरेजी अख़बारों की तरह करने की कोशिश की है। पिछले कुछ सालों से वह बिलकुल अंगरेजी अख़बारों की तरह बजट पेश कर रहा है। अंगरेजी में किसी थीम पर बजट आधारित होता है। इस बार भास्कर में मौसम थीम पर बजट है। दो साल पहले हैरी पॉटर की थीम पर चिंदबरम को पेश किया गया था, पिछले साल वाद्य यंत्रों की थीम पर। क्रिएटिव डेस्क ने बेहतरीन काम किया है। प्रथम पेज पर हमेशा की तरह लहरी छाए हुए हैं। क्रिऐटिव टीम ने अच्छा काम किया है। भास्कर ने लिखा है कि बजट में सूखा है। मौसम थीम होने के बाद भी कुछ संस्करणों में हेडिंग से गफलत हुई है नागपुर संस्करण में महाराष्ट्र चुनावों के कारण हेडिंग अपनी थीम से हटकर चुनावी राग, वादों की थाप दिया गया है। सिटी भास्कर आज नहीं दिया गया है (दिल्ली में सिटी भास्कर नहीं है) उसकी जगह बजट भास्कर है। कुल मिलाकर हिंदी अख़बारों में भास्कर ठीक है।
▐► हिंदुस्तान
हिंदुस्तान ने लिखा है बंगाली बाबू ने प्रसिद्ध जादूगर पीसी सरकार जैसी जादूगरी दिखाते हुए कमाल कर दिया है। अगली ही दो लाइनों में लिखा है बजट में भाषण था आम आदमी को सपने दिखाकर प्रणब इनकम टैक्स में दस हजार की छूट के अलावा कुछ नहीं दे पाए। हिंदुस्तान ने साफ लिखा है कि इस बजट में आम आदमी को कुछ नहीं मिला वरना लगभग हर अख़बार गोल-मोल हेडिंग देकर पूरा का पूरा अख़बार बजट को समर्पित कर रहा है। हिंदुस्तान ने ऐसा न करते हुए दूसरी ख़बरों को भी जगह दी है। यहां ये बात सही है कि अगर बजट में कुछ नहीं है तो क्यों 16 से 35 पेज के अख़बार में सिर्फ और सिर्फ बजट दे रहे हो। प्रणब दा को जादूगर की तरह पेश किया गया है। बैकग्राउंड गुलाबी रखा गया है लेकिन यह गुलाबी रंग ये संकेत देता है कि बजट में गुलाबी सपने दिखाए गए है, जो शायद ही कभी सच हों।
▐► पत्रिका
पत्रिका ने प्रणब दा के बजट को गांवों के लिए अच्छा बताया है। इलेशट्रेशन भी कुछ ऐसा ही बनाया जिसमें प्रणब मुखर्जी किसान बने हैं और ट्रैक्टर में बैठकर गांव की ओर जा रहे है। बगल में शेयर बाजार पर बिजली गिरी है। लेकिन एक बात अखरती है कि पिछले साल जब राजस्थान पत्रिका का विस्तार नहीं हुआ था तब अच्छे पेज बनते थे। इस बार कंटेट की कमी तो है ही ग्राफिक्स भी अच्छा नहीं है। अंदर के नौ पेजों पर बजट लेटाया गया है। इंदौर के प्रथम पेज पर एक अर्थशास्त्री की टिप्ण्णी है।
▐► नईदुनिया
नईदुनिया का आइडिया और पत्रिका का आइडिया एक जैसा है। ख़बर को बिलकुल एक जैसे तरीके से ही उठाया गया है। नईदुनिया ने भी दादा की झप्पी नाम से वित्त मंत्री को ट्रैक्टर पर बैठाकर गांव की ओर पहुंचा दिया है। संपूर्ण चित्रण गांव का किया है। अंदर के पेजों पर लिखा गया कि खास नहीं हो पाया बजट। हां नईदुनिया ही एक ऐसा अख़बार है जिसने प्रथम पेज पर दूसरी ख़बरों को भी स्थान दिया है। एक महत्वपूर्ण ख़बर जिसमें माननीय मुख्य न्यायाधीश ने अपनी टिप्ण्णी के लिए माफी मांगी है। प्रथम पेज में वह नईदुनिया पर ही है और कहीं नहीं। बजट की चकाचौंध में सभी अख़बार (जागरण के नेशनल एडिशन को छोड़कर) इस ख़बर को भूल गए शायद कि ये भी प्रथम पेज पर जगह मांगती है। नई दुनिया ने अंदर चार पेजों पर बजट का प्रस्तुतिकरण किया है। बिना तामझाम के सिंपल ग्राफिक्स के साथ बजट को अच्छे से पेश किया गया है। लेकिन पेज 22 ऐसा लगता है जैसे मेट्रीमोनियल छापा गया हो। बुलैट लगाकर फ्लैट टैक्सट छोड़ दिया है जबकि अच्छे से पेश करने की गुंजाइश भी थी। बजट टीम के नाम देखकर लगता है बजट इंदौर में बना है। दिल्ली, इंदौर संस्करण से बिलकुल अलग है, सिर्फ प्रथम पेज बाकी अंदर के पेज बिलकुल अलग हैं। इससे ये लगता है कि सिर्फ प्रथम पेज को लेकर ही टीम वर्क हुआ है। शेष इंदौर और दिल्ली की टीम ने अलग काम किया है। वैसे दिल्ली के अंदर के पेज अच्छे हैं। इंदौर-दिल्ली की टीम साथ मिलकर काम करती तो निश्चित ही बेहतरीन अख़बार निकल सकता था।
▐► दैनिक जागरण
दैनिक जागरण का राष्ट्रीय संस्करण दिल्ली संस्करण से अलग है। दोनों संस्करणों में जमीन आसमान का अंतर है। जितनी अच्छी तरह से दिल्ली संस्करण निकला है, उतनी बुरी तरह से राष्ट्रीय संस्करण में बजट की प्रस्तुति की है। लुधियाना, कानपुर और दूसरे अख़बारों का प्रस्तुतिकरण अलग है। इससे ये पता चलता है कि जागरण जैसे बड़े अख़बार में सेंट्रल डेस्क है जिसका फायदा हर संस्करण नहीं लेता। क्योंकि ख़बर तो एक ही है बजट, फिर अलग-अलग क्यों समझ से परे है। लोकल लेवल पर ख़बरें उठाना एक अलग बात है जब नेशनल ख़बर हो तो सेंट्रल डेस्क से भेजा गया पेज प्रकाशित किया जाए तो क्या बुराई है। भास्कर, टाइम्स, एचटी, हिंदुस्तान, देशबंधु ने ऐसा ही किया है, उसके सभी संस्करणों में एकरूपता है। भोपाल संस्करण तो और भी अलग है, वो अलग भी हो सकता है क्योंकि संस्था एक है लेकिन मालिक अलग-अलग हैं।
▐► अन्य अख़बार हरिभूमि, देशबंधु, राज एक्सप्रेस, प्रभात ख़बर ने भी प्रयास किया है, लेकिन कामयाब कोई नहीं हो पाया है।
रविवार, जुलाई 05, 2009
एक्सपोज के लिए सिंगल बॉक्स ही काफी है
कल रेल बजट से सारे अख़बार पटे पडे़ थे। हर कोई दीदी के बजट की तारीफ कर रहा था। क्या बजट है, किराया नहीं बढ़ाया, माल भाड़ा नहीं बढ़ाया, किसी ने बजट को लोकलुभावन खिचड़ी बताया, किसी ने यात्री हित का। लेकिन रेल मंत्री तो रेल मंत्री होता है, वो कभी क्षेत्रवाद से उभर नहीं पाता। जब लालू यादव रेल मंत्री थे, तो हर मुख्य ट्रेन बिहार जरूर जाती थी। अगर कोई नया प्रोजेक्ट है तो बिहार के खाते में जाता था।
इस बार भी ऐसा हुआ लेकिन हवाई चप्पल पहनने वाली ममता दीदी की बाजीगरी किसी को नज़र नहीं आई हर अख़बार ने इस बजट को पांच में साढे तीन या चार अंक तक दे दिए। अख़बार की दुनिया में एक बात कही जाती है, जरूरी नहीं कि किसी चीज को एक्सपोज करने के लिए पूरे पेज की स्टोरी की जाए, बस एक सिंगल बॉक्स ही काफी है। ममता के रेल बजट की पोल भी ऐसे ही खुली है, इस बार वो काम किया है टाइम्स ऑफ इंडिया ने, टाइम्स ने भी पूरे तामझाम के साथ अपना शनिवार का अंक रेल बजट को समर्पित कर दिया, लेकिन प्रथम पेज पर सारी घोषणाएं दिखाने के साथ ये बताया कि कितनी घोषणाएं बंगाल के खाते में गई हैं। अगर दीदी के बजट का अनुपात देखा जाए तो सब कुछ तो बंगाल को ही मिला है।सर्विस टोटल बंगाल का हिस्सा
नई ट्रेनें 309 181
नॉन स्टॉप ट्रेनें 12 4
नई ट्रेनें ५७ 15
बढ़ाई ट्रेनें 27 7
सुपर फास्ट ट्रेनें 3 1
नई लाईंस 53 19
डबल लाईंस 12 4
कोच फैक्ट्री 1 1
नई ट्रेनें 309 181
नॉन स्टॉप ट्रेनें 12 4
नई ट्रेनें ५७ 15
बढ़ाई ट्रेनें 27 7
सुपर फास्ट ट्रेनें 3 1
नई लाईंस 53 19
डबल लाईंस 12 4
कोच फैक्ट्री 1 1
इनडोर स्टेडियम १ १
मेडिकल कॉलेज १८ 4
मेडिकल कॉलेज १८ 4
दूसरे किसी अख़बार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। बिहार के अख़बार ये रोना रोते रहे कि हमारे लालू नहीं हैं इसलिए हमारी उपेक्षा हुई है। महाराष्ट्र के अख़बार इसलिए खुश थे कि उन्हें थोड़ा बहुत मिल गया, क्योंकि अक्टूबर-नवंबर में चुनाव जो है। वहीं मध्यप्रदेश वाले फिर रोना रोते नजर आए कि इस बार भी कुछ नहीं मिला। कुल मिलाकर ये हमारे लिए सीखने वाली बात है कि बजट, जो आम आदमी की रुचि का विषय जरूर है लेकिन उसके पल्ले बहुत कम बातें पड़ती हैं। इसलिए ऐसी बातें निकाली जाएं जिसे वह उस दिन ज्यादा से ज्यादा समझ सके।
बुधवार, जुलाई 01, 2009
अख़बारों के भरोसे चैनल वाले
कहते हैं न्यूज़ चैनल सबसे पहले ख़बर दिखाते हैं। वे सबसे तेज़ होते हैं, लेकिन आजकल ऐसा नहीं हो रहा है। न्यूज़ चैनल की दुनिया में ख़बरों की कंगाली का दौर आ गया है। तभी तो उनकी अधिकांश ख़बरें अख़बारों से आती हैं। कभी-कभार एक दो ख़बर ले लेना ठीक है, लेकिन आजकल तो न्यूज़ चैनल किसी भी ख़बर को तब गंभीरता से लेते हैं, जब किसी ख़बर को अख़बार प्रमुखता से प्रकाशित करते हैं। पिछले दिनों सभी न्यूज़ चैनल दिल्ली में बिजली-पानी की किल्लत पर ख़बर दिखा रहे थे, उनसे कई दिन पहले टाइम्स, नईदुनिया, एचटी और कई अख़बार विशेष पेज़ देकर इन मुद्दों को उठा चुके थे। जब दो-चार जगह बिजली कटौती से नाराज़ लोगों ने तोड़फोड़ की तो न्यूज़ चैनलों को लगा, वाकई बिजली कटौती की ख़बर बड़ी है। जिस दिन शाम को अधिकांश चैनल ये कह रहे थे कि दिल्ली में बिजली की मांग और आपूर्ति में बड़ा अंतर आ गया है। उस दिन टाइम्स ने प्रथम पेज पर उस ख़बर को प्रकाशित किया था जिसमें मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने बिजली वितरण कंपनी को फटकार लगाई थी। इस पर कुछ बेशर्म (माफ कीजिए ऐसा करने पर ऐसे ही शब्द इस्तेमाल करें तो ठीक है) चैनल कहने लगे सबसे पहले हमने ख़बर बताई थी कि बिजली की कमी है। जबकि उससे पहले उन्हें कॉमेडी सर्कस और राखी सावंत के स्वयंवर से फुर्सत नहीं थी। वो तो मूलभूत परेशानियों को भूलकर डीयू के एडमिशन और कैंपस के ग्लैमर को दिखाने में लगे थे। आज न्यूज़ चैनल वाले चिल्ला रहे थे, इरफान पठान की शादी है,,,आप उनको बधाई दीजिए,,,यही है वो लड़की शिवांगी जिसने इरफान का दिल चुराया है। लेकिन विजुअल के नाम पर कुछ भी नहीं सिर्फ शिवांगी की तस्वीर थी। वो भी अख़बारों से उठाकर एनिमेट की थी। कभी उस तस्वीर को दाएं से दिखाते रहे कभी बाएं से। बार-बार इरफान पठान और उनके अब्बू का विजुअल दिखाते रहे। ये भी कह रहे थे कि कई बार दोनों की मुलाकात हुई है,दोनों ऑस्ट्रेलिया में मिले थे। अरे भई ये समझ नहीं आता कि दोनों मिले हैं आप जानते हैं तो विजुअल क्योंकि नहीं, भारत का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तो विजुअल जुटाने में माहिर है। दिनभर सभी चैनलों पर इरफान की शादी पर विशेष कार्यक्रम चले लेकिन शिवांगी का विजुअल स्टार न्यूज़ के अलावा किसी चैनल पर देखने को नहीं मिला। स्टार न्यूज़ के पास भी बस दो या तीन सेकेंड का विजुअल था जिसे वे बार-बार दिखा रहे थे। एक दौर था (कोई दो साल पहले तक ) जब हर ख़बर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पहले देता था। अख़बार से पहले लोग ख़बर देख लेते थे। अख़बारों के सामने चुनौती पैदा हो गई थी कि कैसे पाठकों को बांधे रखा जाए, क्योंकि हर ख़बर तो पाठक पहले ही न्यूज़ चैनलों पर देख लेता था। तब वह अख़बार क्यों पढ़ेगा। तब पूरी प्रिंट मीडिया बिरादरी ने अपने कंटेंट को लेकर नए सिरे से सोचना शुरू किया और ख़बर की ख़बर लेना शुरू की। ऐसे पाइंट उठाए जो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से छूट जाते थे। अभी हाल ही में एक सर्वे आया है जिसमें बताया है अख़बारों के पाठकों में बढ़ोतरी हुई है, जबकि न्यूज़ चैनलों के दर्शकों के जबरदस्त कमी आई है। ऐसा नहीं है कि पाठक और दर्शक अलग हैं, ये एक ही आदमी है। जो कभी टीवी देखता है तो कभी अख़बार पढ़ता है। कुछ लोग ही होते हैं जो दोनों में से एक को पसंद करते हैं। क्योंकि ये जरूरी नहीं कि जो अख़बार पढ़ता हो वो टीवी नहीं देखता। कुल मिलाकर लोगों ने न्यूज़ चैनल देखना कम कर दिया है, और कुछ लोग जो अख़बार नहीं पढ़ते थे वो अख़बार पढ़ने लगे हैं। मेरे कहने का मतलब ये नहीं कि न्यूज़ चैनल वाले काम नहीं करते, लेकिन इन दिनों काम नहीं कर रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में जो ख़बरों की कमी का दौर चल रहा है, उस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। क्योंकि हर दर्शक लॉफ्टर देखकर बोर हो चुका है। कब तक यू ट्यूब के भरोसे चैनलों की जिंदगी चलेगी,,,क्योंकि हर आदमी न्यूज़ चैनल देखता है लेकिन वहां न्यूज़ नहीं मिलती।
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