सोमवार, नवंबर 16, 2009

बाल ठाकरे के लेख का हिंदी अनुवाद


बाल ठाकरे का भौंकता हुआ लेख जो उन्‍होंने सामना में लिखा है वो और उसका हिंदी अनुवाद। भौंकता शब्‍द के इस्‍तेमाल के लिए सुधि मित्रों से माफी चाहता हूं, लेकिन सचिन तेंडुलकर जैसे महानतम खिलाड़ी पर अंगुली उठाना मैं अपनी बेइज्‍जती समझता हूं। अब कुछ लोग पत्रकारिता को हथियार बनाने लगे हैं। सामना भी शिवसेना का हथियार ही है। जहां बाल ठाकरे को जो लिखना है वो लिख देते हैं। हमारी इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया भी उस लेख पर कार्यक्रम पर कार्यक्रम बनाकर चलाने लगती है। मेरा कहना है ऐसे लोगों को हाइप ही मत दो साले लिखना ही बंद कर देंगे। वैसे भी ये क्‍या खाक पत्रकारिता करेंगे। बदतमीजों को अख़बार की भाषा ही नहीं मालूम। बाल ठाकरे के सामना के ही हिंदी संस्‍करण में महेश भट्ट को लेकर एक ख़बर जिसमें उनके बेटे का हेडली से संबंध है। उस पर सामना का हेडिंग है ‘क्‍यों नहीं भौंक रहे महेश भट्ट’ ये कौन सी मर्यादित भाषा है। देश का इतना बड़ा कलाकार जिसका पूरी परिवार फिल्‍म उद्योग में अपना खून पसीना बहा रहा हो उसे कुत्‍ता लिख दिया। थोड़े ही दिन की बात है देख लेना राज ठाकरे भी एक अख़बार निकालेंगे फिर किसी न किसी से मराठी में लेख लिखवाएंगे और अपने नाम से छपवा देंगे।
बहुत दिनों बाद ब्‍लॉग पर अपनी आमद दी है। इसके माफी दीजिएगा, दरअसल बेटी तीन महीने की है इसलिए उसका ध्‍यान रखने में गड़बड़ हो रही है।

रविवार, नवंबर 08, 2009

हमें माफ कर देना प्रभाषजी...

हमें माफ कर देना प्रभाषजी...जिस इंदौर शहर पर आप इठलाते थे और मैं इठलाता हूं। उस शहर ने अपने सपूत को अंतिम वक्‍त में याद नहीं किया। अरविंदजी ने भड़ास पर लिखा है कि शहर की गिने चुने पत्रकार ही आपकी अंतिम यात्रा में पहुंचे, ये सुनकर एक आघात सा लगा। इंदौर वही शहर है जब पिछले दिनों एक पत्रकार पर हमला हुआ था तो सभी पत्रकारसाथी सड़क पर उतर आए थे। और जब आज पत्रकारिता का वटवृक्ष जिसकी छाया तले कई लोंगों ने शीतलता का आनंद लिया है। वो वटवृक्ष नहीं रहा तो उसकी निर्जिव काया को कंधा देने तक कोई नहीं पहुंचा। इतना बेइमान तो नहीं था ये इंदौर शहर...। ये तो वो शहर है जब बंदर या नंदी की मौत हो जाती है तो लोग गोजबाजे के साथ अंत्‍येष्टि करते हैं। अखबार वाले तीन या चार कॉलम खबर लगाते हैं। पांच महीने पहले इंदौर गया था तो लगा शहर मेट्रो सिटी बनता जा रहा है। लेकिन ये नहीं सोचा था कि पोहा जलेबी खाने वाले शहर के लोगों की दिल अखरोट की तरह सख्‍त हो जाएंगे। और तो और पत्रकारिता की नर्सरी कहलाते वाले शहर के पत्रकारों को क्‍या हो गया है। समझ नहीं आता है इंदौर जहां के पत्रकार सबसे ज्‍यादा एकजुट हैं, पत्रकार साथी पर कोई विपदा आती है तो कंधे से कंधा मिलाते हैं। फिर एक युग पुरुष की विदाई पर ये बेरुखी क्‍यों...। प्रभाषजी का इंदौरीपन कभी नहीं छूटा...दो साल से दिल्‍ली में हूं हर सप्‍ताह उनका कागद कारे पढ़ता रहा हूं। लेकिन उन्‍होंने हमेशा ‘अपन’ शब्‍द का इस्‍तेमाल किया। कभी मैं का इस्‍तेमाल नहीं किया। उन्‍होंने मालवीपन को पत्रकारिता की शैली बना दिया। लेकिन मालवा के पत्रकार उन्‍हें अंतिम पलों में श्रद्धांजलि तक नहीं दे पाए...शर्म से सिर झुक गया है। रज्‍जू बाबू (राजेंद्र माथुर) के बाद एक वर्तमान था प्रभाष जोशी...वो भी अब रज्‍जू बाबू के समकक्ष हो गया है। अरविंदजी ने लिखा कि लकड़ी कंडे भी न मिलते...ये सुनकर दिल रो पड़ा...हमें माफ कर देना प्रभाषजी... हमें माफ कर देना
फोटो – अखिल हार्डिया, इंदौर

शुक्रवार, नवंबर 06, 2009

जानते हो प्रभाषजी कहां के है...इंदौर के

अपने यहां भी जनसत्‍ता आता है, जब देखा सचिन ने 17 हजार पार कर लिए हैं तो सोच लिया था आज का बॉटम तो प्रभाषजी जरूर लिखेंगे। लेकिन मुझे क्‍या पता था मेरा अनुमान इतना गलत निकल जाएगा। सचिन के उपलब्धियों पर लिखने वाले प्रभाषजी हमे छोड़कर चले जाएंगे। जब भी प्रभाषजी की बात चलती तो इठलाते हुए मैं हमेशा कहता था जानते हो प्रभाषजी कहां के हैं....इंदौर के हैं। इंदौर में महान लोग होते हैं सच में इंदौर में महान लोग तो नहीं इंदौर में महान पत्रकार जरूर होते हैं। राजेंद्र माथुर फिर प्रभाषदा। जी भारी है सोचता हूं अब मैं कैसे कहूंगा प्रभाषजी इंदौर के हैं...जब से पत्रकारिता की समझ हुई सिर्फ दो नाम सुने राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी। रज्‍जू बा को तो देख नहीं सका लेकिन प्रभाषदा को सुना भी मिला भी देखा भी। जब भी वो कागद कारे में अपन लिखते तो मन करता कोई मालवी दिल्‍ली में कितनी सहजता से अपनी बोली लिख रहा है। आज भी जनसत्‍ता आया है लेकिन बिना प्रभाषजी और शायद अब ऐसा ही आएगा...