सोमवार, अगस्त 10, 2009

अपने हीरो तो भोले भैया हैं

भोले भैया रोज आते हैं। बड़े सभ्‍य आदमी हैं हमारे भोले भैया। मेरे हीरो हैं वो। रोज पौ फटते ही दरवाजे पर किसी तेज के टकराने की आवाज आती है। उस आवाज से ही मेरी नींद खुल जाती है। मैं तेजी से दरवाजे की ओर भागता हूं। उत्‍सुकता से उस बंडल को उठाता हूं जो भोले भैया फेंककर जाते हैं। वो बंडल होता है अख़बार का। भोले भैया एक दशक से अख़बार बांटने का काम कर रहे हैं। सर्दी हो या गर्मी उन्‍हें कोई फर्क नहीं पड़ता वे बस अपना काम करते हैं। मैं भी ख़बरें बनाने का काम करता हूं। कभी बारिश होती है तो मैं फोन कर अपने संपादक को बता देता हूं, थोड़ी देर से दफ्तर पहुंचूंगा, लेकिन अपने भोले भैया तो वक्‍त के इतने पक्‍के हैं कि छह से सात के बीच अख़बार डाल जाते हैं। भले बारिश मूसलधार हो रही हो या सावन की झड़ी लग रही हो। अपने भोले भैया अपने ग्राहक का इतना ख्‍याल रखते हैं कि बारिश में अख़बार न गीला हो जाए इसलिए पन्‍नी लगाकर देते हैं। दो से ज्‍यादा अख़बार लो तो उस बंडल को रबर से बांध कर अख़बार डालते हैं, ताकि अख़बार फेंकते वक्‍त खुले नहीं। हमारे भोले भैया का निशाना इतना अचूक है कि आप दूसरी मंजिल पर रहो या पांचवीं अख़बार सीधा आपकी गैलेरी में ही जाएगा। हम तो सिर्फ अख़बार बनाते हैं कि संपादकजी अख़बार चेक करते हैं, कंप्‍यूटर ऑपरेटर पेज बनाता है, उपसंपादक ख़बर संपादित करता है,मशीन वाले अख़बार छापते हैं लेकिन असली हीरो तो भोले भैया हैं जो इन सब की मेहनत को सार्थक कर अख़बार पाठक तक पहुंचाते हैं। अगर भोले भैया न हो तो ख़बरों की भूख भी न मिटे। भोले भैया इतने कर्मठ हैं रोज चार बजे उठ जाते हैं। हम तो साप्‍ताहिक अवकाश भी लेते हैं लेकिन भोले भैया कभी छुट्टी नहीं लेते, साल की चार छुट्टियां ही लेते हैं। अगर अख़बार मालिकों ने चाहा तो ये चार छुट्टियां भी कम हो जाएंगी। याने भोले भैया साल के तीन सौ पैंसठ दिन काम करेंगे फिर भी गिनीज बुक में उनका नाम न आएगा। एक बार भोले भैया सर्दी के सीजन में मफलर ओढे आए बोले तबियत खराब है हमने कहा छुट्टी ले लो। बिना कुछ कहे भोले भैया ने अपनी शर्मिली मुस्‍कराहट बिखेरी और बिल का जो पैसा बना लेकर चलते बने। समय के इतने पाबंद हैं कि हर महीने की एक तारीख को मासिक पत्रिका, सप्‍ताह की शुरुआत में साप्‍ताहिक पत्रिका दे जाते हैं। अख़बार उनसे जो चाहे मांग लो उपलब्‍ध करा देते हैं। ये ही बात हमारे रिपोर्टर से कहो तो उनकी सांस पलभर के लिए फूल जाती है, लेकिन भोल भैया दिल्‍ली का टाइम्‍स मांगों तो हाजिर है,बंबई को मिरर मांगों तो हाजिर है,जनसत्‍ता मांगों तो हाजिर है। भोले भैया आप ही वो आदमी हो जो दंगों में मारकाट के बीच अपनी साइकिल पर घूमने का माद्दा रखते हो। आप ही जो जीरो डिग्री तापमान में भी साइकिल पर ठंड को चिढ़ाते हो। आप ही जो सावन की झड़ी में रेनकोट में ढंके होकर अख़बार डालते हो। भोले भैया मैं राष्‍ट्रपति नहीं हूं, वरना आपको पद्मश्री दे देता। आप को भले ही कोई तमगा न दे लेकिन आपके चेहरे पर मुस्‍कान और आंखों में संतुष्टि की चमक नज़र आती है। इसलिए आप ही मेरे हीरो हो।

रविवार, अगस्त 02, 2009

‘सिडनी मॉर्निंग हेराल्‍ड’ के भरोसे हिंदुस्‍तान टाइम्‍स

अगर आज ऑस्‍ट्रेलिया के अख़बार ‘सिडनी मॉर्निंग हेराल्‍ड’ की एक्‍सक्लूसिव ख़ब होती तो आज के हिंदुस्‍तान टाइम्‍स की संडे स्‍पेशल लीड ख़बर भी न होती। क्‍योंकि हिंदुस्‍तान टाइम्‍स ने पूरी ख़बर वहीं से टीपी है, वो भी अपने दो रिपोटर्स की बायलाइन के साथ। यार ये कौन सी पत्रकारिता है, ये तो सुना था कि विदेशी अख़बार का आइडिया लो और उसका देसीकरण कर दो लेकिन हिंदुस्‍तान टाइम्‍स ने तो पूरी की पूरी ख़बर ही ले ली और लिख दिया संडे स्‍पेशल वो भी अपने रिपोटर्स की बायलाइन के साथ। हमारा प्रिंट मीडिया भी इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया की तरह हो गया है क्‍या। इस ख़बर की खास बात है कि जिस देश के खिलाफ ख़बर लिखी गई है वो हिंदुस्‍तान टाइम्‍स पर मुकदमा न कर दे इसलिए ख़बर में ये हवाला भी दे दिया गया है कि ये ख़बर ऑस्‍ट्रेलिया के सिडनी मॉर्निंग हेराल्‍ड में छपी है । तो ये एचटी वाले पाठक को इतना मुर्ख समझते हैं कि वो ये भी न समझेंगे कि हेराल्‍ड में छपी है तो चोरी की ही होगी, इसमें स्‍पेशल जैसी क्‍या बात है। ख़बर है वैसे ही छाप दो ख़बर बस।